244 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
हमें आशा है कि आर्थिक जोत की यह परिभाषा बड़ौता कमेटी स्वीकार कर लेगी, क्योंकि यह कमेटी द्वारा की गई तीसरी परिभाषा से मिलती - जुलती है। यदि हम यह मान लें कि सब इस बात पर सहमत हो जाएंगे तो हम यह देखेंगे कि यह परिभाशा कितनी तर्कसंगत या समर्थन योग्य है।
यह बात स्पष्ट है कि प्रो. जेवन्स की परिभाषा सहित ये परिभाषाएं उत्पादन की जगह उपभोग को ध्यान में रखकर दी गई हैं। यही उनकी त्रुटि है, क्योंकि उपभोग वह सही पैमाना नहीं है, जिससे जोत की आर्थिक प्रकृति आंकी जा सके। यह कहना तर्क - विरुद्ध होगा कि एक जोत इसलिए लाभकारी नहीं है कि वह एक परिवार का पेट नहीं पाल सकती, फिर चाहे उनकी पैदावार उस पर किए गए हर निवेश के अनुपात में अधिकतम हो। किसान के परिवार को केवल इस दृष्टि से देखा जा सकता है कि उसके पास कितने लोग काम कर रहे हैं। हो सकता है कि उनके पास काम करने वाले कुछ लोग फालतू (सरप्लस) हों। परंतु सामाजिक दृष्टि से उनका पालन जरूरी होता है, जैसा कि भारत में प्रायः होता है। परंतु यदि सामाजिक रीति - रिवाज किसान को विवश करें कि वह कुछ ऐसे सदस्यों का भी पालन - पोषण करे जो खेती के काम में उसके लिए उपयोगी नहीं हो सकते, तो इनका दोष हमें जोत पर नहीं डालना चाहिए कि वह किसान के लिए काम करने वालों का और उस पर निर्भर परिवार के सभी सदस्यों का पेट नहीं भर सकती। यदि हम हिसाब - किताब का यह तरीका अपनाएं तो कई उद्यमों को अत्यंत लाभकारी होने पर असफल माना जाएगा। उद्यमी के परिवार और उसके कुल उत्पादन या पैदावार के बीच कोई आर्थिक संबंध नहीं हो सकता। आर्थिक संबंध तो केवल कुल उत्पादन और कुल निवेश के बीच हो सकता है। यदि निवेश के मुकाबले कुल उत्पादन अधिक होता है, तो कोई भी उद्यमी अपना उद्योग इसलिए बंद करने की नहीं सोचेगा कि इससे उसके परिवार के लिए पर्याप्त पैदावार नहीं होगी। यह बात स्पष्ट है कि यद्यपि उत्पादन उपभोग के लिए होता है, तथापि उन्हीं लोगों के उपभोग को ध्यान में रखा जाता है, तो उत्पादन में सहायता देते हैं। इस आधार पर यह निष्कर्ष निकलता है कि यदि सच्चा आर्थिक संबंध निवेश और कुल उत्पादन के बीच होता है, तो हम केवल ऐसे खेत को आर्थिक दृष्टि से लाभकारी बता सकते हैं, जो उत्पादन की दृष्टि से लाभकारी होता है, न कि उपभोग की दृष्टि से। इसलिए कोई भी परिभाषा जो उपभोग को आधार मानकर बनाई जाती है, वह आर्थिक जोत के बारे में गलत अनुमान लगाती है। वह तो निश्चय ही उद्यम के उत्पादन पर निर्भर करती है। और आगे बढ़ने से पहले हम कुछ प्रारंभिक टिप्पणियां करके कुछ संदेह दूर करना चाहते हैं, ताकि उत्पादन की दृष्टि से आर्थिक जोत को समझने में आसानी हो।
शुरू में ही यह मान लेना चाहिए कि एक प्रतियोगी समाज में सदस्यों के, चाहे वे उपभोक्ता के रूप में हों या उत्पादक के रूप में, सभी सौदों का नियंत्रण बाजार की कीमतों द्वारा होता है। इसके लिए हमें एक कीमत वाली प्रणाली में उत्पादन का अध्ययन करना है। आजकल उद्यमी को उत्पादन की सभी आधुनिक प्रक्रिया को ध्यान में रखकर कैप्टन की तरह काम करना पड़ता है। वह सारी प्रक्रिया का मार्गदर्शन करता है, उसकी देखभाल