भारत में छोटी जोतों की समस्या और उसका निवारण 245
करता है और उसकी योजना बनाता है। श्रमिकों और सामान को उत्पादन कार्यों में लगाने वाले उद्यमी ही होते हैं। मुद्रा पर आधारित समाज में उनका सारा हिसाब मूल्य - परिव्यय पर आधारित होता है, न कि मूल्य - उत्पाद पर, चाहे वह अपना उत्पाद बेचे या न बेचे। उद्यमी लाभ के लिए काम करता है और इसलिए अपना परिव्यय विभिन्न निवेशों में लगाता है। ये निवेश उत्पादन के कारण होते हैं, अथवा इन्हें उद्यमी के लिए लागत की संज्ञा दी जा सकती हैं। परंपरा के आधार पर इन्हें वेतन (श्रम), लाभ, किराया (भूमि) और ब्याज (पूंजी) में बांटा जा सकता है। औद्योगिक तथ्य इस वर्गीकरण का समर्थन नहीं करते। वितरण की प्रक्रिया में भाग लेने वाले कई और भी कारक होते हैं, जो कि उत्पादन की प्रक्रिया में नजदीक से या दूर से भाग लेते हैं। परंतु इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि कितने कारक हैं और वे एक - दूसरे से किस तरह भिन्न हैं। महत्वपूर्ण बात यह है कि उत्पादन के लिए मिल - जुलकर उनका उपयोग किया जाए।
उत्पादन के विभिन्न कारकों का उपयोग समानुपात के नियम के अनुसार किया जाता है। इस नियम में बताया गया है कि यदि उत्पादन के विभिन्न कारक गलत अनुपात में लगाए गए, तो उससे हानि होना अवश्यंभावी है। यदि इस सिद्धांत का विस्तार किया जाए तो कहा जा सकता है कि एक कारक दूसरे कारक से मिलकर अधिकतम कुशलता से तभी काम कर सकता है, जब वह एक निश्चित मात्रा में लगाया गया हो। कए कारक के मुकाबले दूसरा कारक कम या ज्यादा लगाया जाए, तो उससे सभी कारकों की कार्यकुशलता कम हो जाएगी। विभिन्न कारकों की परस्पर निर्भरता को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि यदि एक कारक की मात्रा में फेरबदल की जाए, तो उद्यमी को कुशल उत्पादन के लिए उसी अनुपात में अन्य कारकों में भी परिवर्तन करना होगा। दूसरा कोई तरीका नहीं हो सकता, क्योंकि कुशल उत्पादन का मतलब यही होता है कि हर कारक का अधिकतम लाभकारी ढंग से उपयोग किया जाए और यह तभी हो सकता है, जब उस कारक का अन्य कारकों से वांछित मात्रा में सहयोग हो। इस तरह एक आदर्श समानुपात होता है, जो मिलकर काम करने वाले विभिन्न कारकों के बीच में रहना चाहिए, यद्यपि यह आदर्श विभिन्न कारकों के समानुपात में फेरबदल करने पर बदल सकता है। ख्17,
यह बात स्वीकार करनी पड़ेगी कि यह अनुपात प्रतिस्थापन के सिद्धांत से प्रभावित होता है, क्योंकि विभिन्न कारकों की कीमतों में फेरबदल का इस अनुपात पर प्रभाव पड़ता है। परंतु प्रतिस्थापन के सिद्धांत का सीमित मात्रा में ही प्रभाव पड़ता है और यह अनुपात
- उत्पादन की प्रक्रिया का यह वितरण प्रो. एच. जे. डावेनपोर्ट की विद्वतापूर्ण पुस्तक द इकोनोमिक्स ऑफ
इंटरप्राइज, न्यूयार्क मैकमिलन, 1913 से लिया गया है। इस संबंध में प्रो. हेनरी सी. टेलर का प्रबंध टू डाइमेंशन
ऑफ प्रोडक्टिविटी पठनीय है, जिसे दिसबर 1916 में अमरीकन इकोनोमिक एसोसिएशन की 29वीं वार्षिक बैठक
में पढ़ा गया था। उस पर प्रो. ए. ए. चंग की टिप्पणी भी उल्लेख है। ये दोनों अमरीकन इकोनोमिक रिव्यू के
मार्च 1917 के अंक में प्रकाशित हुए थे।