5. भारत में छोटी जोतों की समस्या और उसका निवारण - Page 263

246 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय

के नियम को गलत सिद्ध नहीं करता जो हमेशा आर्थिक उत्पादन को चलता है और कोई भी उत्पादक हानि उठाए बिना उसकी उपेक्षा नहीं कर सकता। ख्18,

यदि उत्पादन के बारे में उल्लिखित टिपणियों को हम लाभकारी जोत की परिभाषा पर लागू करें तो हम यह मानकर चल सकते हैं कि यदि कृषि को आर्थिक उद्यम माना जाए, तो छोटी या बड़ी जोत जैसी कोई चीज नहीं हो सकती। एक किसान के लिए कोई जोत छोटी है या बड़ी, यह इस बात पर निर्भर करता है कि लाभकारी उद्यम के रूप में कृषि को चलाने के लिए उसके पास बाकी कारक कितने हैं। केवल भूमि के आकार का तो कोई आर्थिक महत्व नहीं। इसलिए अर्थशास्त्र के विज्ञान की भाषा में यह नहीं कहा जा सकता कि एक बड़ी जोत लाभकारी है और एक छोटी जोत अलाभकारी। इस तरह एक छोटी जोत भी लाभकारी हो सकती है और एक बड़ी जोत भी, क्योंकि जोत का लाभकारी और अलाभकारी होना उसके आकार पर नहीं, बल्कि भूमि समेत सभी कारकों के उचित अनुपात पर निर्भर करता है।

इस तरह लाभकारी जोत को यदि कोरी धारणा नहीं होना है तो इसमें भूमि, पूंजी और श्रम, आदि का इस अनुपात में मिश्रण होना चाहिए कि दूसरों के साथ मिलकर हर कारक का योगदान अधिकतम हो। दूसरे शब्दों में, लाभकारी जोत बनाने के लिए किसान के लिए केवल यही काफी नहीं है कि वह भूमि की मात्रा बढ़ाता जाए। उसे कुशल खेती के लिए आवश्यक अन्य कारकों की मात्रा भी उचित रूप में बढ़ानी पड़ेगी और सभी कारकों को उचित अनुपात में रखना पड़ेगा, क्योंकि उसके बिना कुशलतापूर्वक पैदावार नहीं होगी। यदि उसके उपकरण कम हो जाते हैं तो उसे जोत का आकार भी कम करना चाहिए। यदि उसके उपकरण बढ़ जाते हैं तो उसकी जोत का आकार भी बड़ा होना चाहिए। असली मुद्दा यह है कि उपकरण और जोत के आकार का अनुपात गड़बड़ नहीं होना चाहिए। उनमें निश्चित अनुपात रहना चाहिए और यदि कुछ कारक कम - ज्यादा रहते हैं, तो उनका अनुपात वही रहना चाहिए।

यहां हमने जिस तर्क - पद्धति का सहारा लिया है, वह व्यवहार में भी आई है। एक अर्थशास्त्री के लिए यह प्रसन्नता की ही बात है कि बंबई प्रेसिडेंसी में सर्वे और बंदोबस्त प्रणाली के जनकों ने इसे स्वीकार भी किया और भारत में अपनाया भी। 1840 की प्रसिद्ध

  1. कुछ अर्थशास्त्री यह विश्वास करते हैं कि कृषि उत्पादन पर उत्तरोत्तर ह्रास प्रतिकार का नियम लागू होता है। वे यह स्वीकार नहीं करेंगे कि समानुपात का नियम सर्वत्र लागू किया जा सकता है। संक्षेप में उत्तरोत्तर ह्रास के नियम के अनुसार, यदि भूमि के एक टुकड़े में अधिकाधिक पूंजी और श्रम लगाएं जाएंगे, तो उसका प्रतिफल बराबर घटता जाएगा। इसका तात्पर्य यह हुआ कि यदि उत्पादन पर गैर - भूमि व्यय बढ़ाकर दो - गुना कर दिया जाए तो पैदावार दो - गुनी कम होगी। परंतु यदि हम उत्तरोत्तर ह्रास प्रतिफल नियम को सामान्य रूप से लागू करना चाहें तो यह बात केवल कृषि उत्पादन पर लागू नहीं होती। यदि भूमि पर होने वाला खर्च दो - गुना कर दिया जाता है और भूमि - दो गुनी नहीं की जाती, तो अतिरिक्त पैदावार बढ़ाए गए खर्च के समानुपात में नहीं होगी। इसी बात को कहने का यह केवल एक और ढंग है कि यदि उत्पादन बढ़ाना है तो सभी कारक समानुपात में बढ़ाए जाएं। इस तरह कहने पर क्या उत्तरोत्तर ह्रास नियम समानुपात नियम का बिगड़ा रूप नहीं है।