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भारत में छोटी जोतों की समस्या और उसका निवारण 247

संयुक्त रिपोर्ट में इस समस्या का शानदार विवेचन किया गया है। दक्कन में सर्वे प्रणाली लागू करने वालों के सामने प्रश्न यह था कि जायजा किस तरह लिया जाए। क्या यह केवल खेतों का जायजा हो या गांव की सारी भूमि का जायजा लिया जाए या व्यक्ति या भागीदारों की समूची जोतों का जायजा लिया जाए, चाहे वे भूमि के मालिक हों या इस पर काबिज हों। यह बात तो बहुतों को पता है कि काफी विचार - विमर्श के बाद खेत का जायजा लेने की प्रणाली अपनाई गई। परंतु यह प्रणाली क्यों अपनाई गई, इसका पता कम ही लोगों को है। इस संदर्भ में संयुक्त रिपोर्ट का व्याख्यात्मक भाग रुचिकर भी है और शिक्षाप्रद भी।

पैरा 6 - जायजा लेने के लिए गांव को अत्यंत छोटे - छोटे हिस्सों (सर्वे नंबर के हिसाब

से) में बांटने का यह स्पष्ट लाभ यह है कि उससे काश्तकारों को प्रति वर्ष खेत

बड़ा करने या छोटा करने का मौका मिलता है, जो उसे उपलब्ध कृषि पूंजी पर

निर्भर करता है और यह किसान के लिए बहुत महत्वपूर्ण होता है, क्योंकि समूचे

भारत में काश्तकार वर्ग के साधन बहुत सीमित हैं।

पैरा 7 - बीमारी या किसी अन्य कारण से यदि कुछ बैलों की मृत्यु हो जाए तो

उससे किसान गांव में उपलब्ध अपनी पिछली जमीन पर लाभकारी ढंग से खेती

करने में कतई अक्षम हो जाता है और यदि उसे फार्म छोटा करने की सुविधा न

मिले तो इसके फलस्वरूप होने वाली हानि से उसकी पूरी तबाही हो जाएगी। ख्19,

इस निष्कर्ष के संदर्भ में जोतों के आकार के नियमन का प्रस्ताव अविचारित और व्यर्थ लगता है। ख्20, जैसा कि प्रो. रिचार्ड टी. एली ने बताया है :

स्पष्ट ही है कि इस प्रश्न का सरल उत्तर नहीं दिया जा सकता (प्रश्न यह है कि

खेत या फार्म का आकार क्या हो)। शायद सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि भूमि

की क्या कीमत है या उसका लगान कितना है। इसके अतिरिक्त कितने बड़े फार्म

पर खेती की जाए और कितनी गहनता से खेती की जाए, यह कई और बातों पर

निर्भर करता है, जैसे वह कितनी पूंजी की व्यवस्था कर सकता है, जिस किस्म की

खेती में वह अधिक प्रवीण है, उसको किस किस्म के श्रमिक उपलब्ध हो सकेंगे,

खेत मंडी के कितना पास है और माल लाने - ले जाने की कितनी सुविधा है।

प्रश्न मुख्यतः यह है कि किसान को कितना फायदा हो। इसका फैसला खुद किसान

को ही करना है। परंतु इस काम में विधायक और विज्ञान के विद्यार्थी उसे कृषि

लेखा - जोखा, जो कि सबसे कठिन वाणिज्यिक विज्ञान है, विकसित करने में कुछ

सहायता कर सकते हैं। कृषि लेखा - जोखा से वे किसान को बता सकते हैं कि

  1. सर्वे सैटिलमैंट मैन्युअल बंबई प्रेसिडेंसी, 1882, पृष्ठ 3

  2. आउटलाइंस आफ इकोनोमिक्स, पृष्ठ 531 - 32