5. भारत में छोटी जोतों की समस्या और उसका निवारण - Page 265

248 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय

कीमतों, वेतन और परिवहन प्रभार में कितने परिवर्तन आ सकते हैं, ताकि फार्म

संगठन अपने को इसके लिए तैयार रख सकें।

जो लोग जोत का आकार निर्धारित करने का दुस्साहस करने को तैयार हैं, उन्हें प्रो. एली की सुविचारित राय से समझ में आ जाएगा कि चाहे उनका विचार कितना ही श्रेष्ठ क्यों न हो, यह धारणा अंततः विपत्ति लाने वाली ही होगी, क्योंकि इसका फैसला केवल किसान ही कर सकता है। उन्हें यह भी याद रखना चाहिए कि समय के साथ - साथ किसान की जोत के आकार में परिवर्तन आ सकता है। उसके उपकरणों में परिवर्तन होने पर उसे उनके अनुरूप आकार की जोत की आवश्यकता पड़ सकती है। एक समय उसे छोटे आकार की जोत उपयुक्त लगेगी, तो दूसरे समय बड़े आकार की। इसलिए यदि कोई अर्थशास्त्री जोत का आकार कानूनी रूप से निर्धारित करने की चेष्टा करता है तो इसका मतलब यह है कि वह बहुत अक्लमंद नहीं है। जोत का आकार तो ऐसा होना चाहिए कि जो लाभकारी ढंग से उत्पादन के आधार पर आवश्यकता पड़ने पर बदल सके। जोत का आकार तय कर देने से यह तो हो सकता है कि जोत बड़े आकार की हो, पर यह नहीं हो सकता कि वह आर्थिक दृष्टि से भी लाभकारी हो। आर्थिक दृष्टि से लाभकारी जोत केवल उसके आकार पर निर्भर नहीं करती। यह तो भूमि के कुशल

खेती के लिए आवश्यक अन्य उपकरणों से सामंजस्य पर निर्भर करता है।

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आज हमारी कृषि की सभी समस्याओं का हल बताया जाता है कि जोत का आकार बड़ा करना। पर यह बात तभी ठीक हो सकती है जब जोत का आकार तो घट गया हो, परंतु कृषि के उपकरणों, ढोरों, आदि की मात्रा बढ़ गई हो। जोत के आकार के बारे में तो आंकड़े पहले ही दिए जा चुके हैं। देखना यह है कि क्या कृषि का स्टाक बढ़ गया है। श्री के. एल. दत्ता ने अपने एक विशद सर्वेक्षण में कहा है ख्21, :

  1. जिन भारतीय साक्ष्यों से हमने पूछताछ की उनमें से अधिकांश का विचार था

कि कृषि उत्पादों की पूर्ति में कमी आई है, क्योंकि भूमि की काश्तकारी कुशल ढंग

से नहीं हो रही। यह बताया गया कि भूमि पर खेती अब उतनी सावधानीपूर्वक और

कुशलतापूर्वक नहीं की जा रही, जितनी पहले की जाती थी, क्योंकि हल, ढोर और

श्रम महंगे भी हो गए हैं और दुलर्भ भी। खेती की लागत में बचत करने के लिए

किसान खेतों में उतनी बार हल नहीं चलाते, जितनी बार पहले चलते थे। इसके

साथ ही खेतों में खाद भी कम दी जाती है, खरपतरवार कम उखाड़े जाते हैं और

  1. रिपोर्ट आन द इंक्वायरी इन्टू द राइज आफ प्राइसेस इन इंडिया, 1914, खंड 1, पृष्ठ 66 - 67