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भारत में छोटी जोतों की समस्या और उसका निवारण 251

भी सहमत हैं, जिनका एक घाटा - वाली अर्थव्यवस्था को आधिक्य वाली अर्थव्यवस्था में बदलने के लिए समर्थन किया जाता है, अर्थात् जोतों का आकार बड़ा किया जाए और चकबंदी की जाए। इस लक्ष्य की प्राप्ति के उपायों के बारे में हमें एतराज है। हमारा यह दृढ़ विश्वास है कि भारत में छोटी जोत की समस्या बुनियादी समस्या नहीं है, बल्कि यह एक मूल समस्या से निकली हुई समस्या है, अर्थात् सामाजिक अर्थव्यवस्था में असमांजस्य की समस्या। इसलिए यदि हम समस्या का स्थायी हल ढूंढ़ना चाहते हैं, तो हमें मूल समस्या को हल करने पर ध्यान देना चाहिए।

परंतु इस पर प्रकाश डालने से पहले हम यह जानना चाहेंगे कि हमारी सामाजिक अर्थव्यवस्था में क्या बुराई है। एब बात बार - बार दोहराई जाती है कि भारत एक कृषि - प्रधान देश है, परंतु जिस बात का बहुत कम लोगों को पता है, वह यह है कि इतनी अधिक भूमि में खेती होने के बावजूद उसकी जनसंख्या के अनुपात में बहुत कम भूमि में खेती होती है।

वर्ष 1895 के बारे में मलहाल में आंकड़े यही दर्शाते हैं : 1895 में प्रति व्यक्ति एकड़ भूमि

ग्रेड आयरलैंड फ्रांस जर्मनी रूस आस्ट्रिया इटली स्पेन अमरीका भारत ब्रिटेन और

पुर्तगाल

0.91 3.30 2.30 1.70 5.60 2.05 1.75 2.90 8.90 1.00

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1895 के बाद तो स्थिति बदतर हो गई है, जैसा कि नीचे के आंकड़ों में स्पष्ट है :

प्रांत 1881 1891 1901 1911 बंगाल 1.5 0.8 1.12 - बंबई 1.7 1.6 1.41 1.3 मद्रास 1.3 0.3 0.68 0.79 आसाम - - 0.5 0.78 0.85 पंजाब 1.2 1.3 1.05 1.11 अवध उ.प.सी. प्रांत 0.81 - - 0.8 0.7 0.73 0.75 बर्मा - - 1.5 1.08 1.09 मध्य प्रांत 1.67 2.4 1.8 1.79 ब्रिटिश भारत 1.04 1.0 0.86 0.88