252 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
अब इस असाधारण तथ्य का तात्पर्य क्या है? खेतिहर जनसंख्या बहुत अधिक है और वास्तविक कृषि के अंतर्गत भूमि को देखते हुए प्रति व्यक्ति भूमि का अनुपात बहुत कम है। इसका अर्थ यह हुआ कि कृषि पर आधारित लोगों का बड़ा भाग कृषि में जरूरत से ज्यादा व्यर्थ में लगा हुआ है और निठल्ला है। यह ठीक से पता नहीं है कि भारतीय कृषि में कितने श्रमिक फालतू लगे हुए हैं। इन फालतू श्रमिकों के बारे में पहले सर जेम्स कैर्ड को पता चला और 1884 में उन्होंने अनुमान लगाया :
इंग्लैंड में जिस एक वर्ग मील क्षेत्र में अच्छी तरह खेती होती है, उसमें 50 व्यक्ति
काम करते हैं - 25 युवा - वृद्ध पुरुष और 25 स्त्रियां और लड़के। यदि भारत में एक
वर्ग मील में इसके चौगुने, अर्थात् 200 लोग भी खेती के काम में लगें तो उसमें
भी भारत की केवल एक तिहाई जनसंख्या लगेगी। ख्24,
1881 में देश की कुल जनसंख्या 25 करोड़ 40 लाख में से लगभग दो तिहाई कृषि पर निर्भर दिखाए गए हैं। उक्त अनुमान के अनुसार, यदि हम एक तिहाई लोग भी खेती के लिए लें तो हम आराम से कह सकते हैं कि उतने ही लोग खाली बैठे रहते हैं, जो कोई उत्पादक कार्य नहीं करते। भारत में बढ़ते हुए ग्रामीणकरण और कृषि के अंतर्गत आने वाली भूमि में उत्तरोत्तर कमी आने के कारण खाली बैठे श्रमिकों की संख्या बेहद बढ़ गई होगी।
इन खाली बैठे श्रमिकों के आर्थिक प्रभाव दो प्रकार के हैं - एक तो इससे कृषि जनसंख्या का जमीन पर भारी दबाव पड़ता है। यह दबाव कितना अधिक है, यह निम्नलिखित आंकड़ों से स्पष्ट होता है :
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अवध और बंगाल मद्रास पंजाब बंबई आसाम बर्मा और कुर्ग ब्रिटिश
उ.प.सी. प्रांत मध्य प्रांत भारत
कुल क्षेत्रफल 427 551 291 177 145 115 122 111 53 के हिसब से
कृषि क्षेत्र के 829 1,162 785 453 444 766 360 792 575 हिसाब से
जमीन पर जनसंख्या का इतना अधिक दबाव सारी दुनिया में किसी और देश में नहीं मिलता। इसका प्रभाव तो स्पष्ट ही है।
अन्य लोगों के कथन के बावजूद जनसंख्या का यह भारी दबाव जमीन के उप - विभाजन का मुख्य कारण है। चूंकि जमीन पर इस दबाव का महत्व समझा नहीं जा रहा, इसलिए उत्तराधिकार का कानून इतना कष्टप्रद बन गया है। यह कहना कि उत्तराधिकार के कानून के कारण जमीन का उप - विभाजन होता है, वास्तविक स्थिति को उल्टा
- इंडिया, द लैंड एंड द पीपल, पृष्ठ 225