भारत में छोटी जोतों की समस्या और उसका निवारण 253
करके गलत ढंग से देखने के समान है। केवल इस कानून का होना ही एक शिकायत नहीं बन सकती। शिकायत तो तब बनती है, जब इसे लागू किया जाता है। पर यदि यह हानिकारक है तो इसे लागू क्यों किया जाता है, सिर्फ इसलिए कि यह लाभकारी है। इसमें कुछ भी अजीब नहीं है। जब खेती का ही धंधा करना हो तो न होने से तो जमीन का छोटा टुकड़ा ही बेहतर है। इस तरह शिकायत की बात ये परिस्थितियां हैं, जिनसे जमीन के छोटे - छोटे टुकड़ों को भी महत्व मिल जाता है। यह महत्व इसलिए मिलता है कि जनता का बहुत बड़ा भाग अपनी जीविका के लिए केवल कृषि पर निर्भर होता है। स्वाभाविक है कि जब लोगों के पास कृषि के अतिरिक्त कुछ है ही नहीं तो वे जमीन का छोटे से छोटा टुकड़ा हासिल करने के लिए हर संभव प्रयास करेंगे। इस जमीन पर भारी दबाव है, जिसकी वजह से ऐसा होता है। लोग मीन के छोटे टुकड़ों पर इसलिए खेती करते हैं, क्योंकि जैसा कि प्रो. जेवन्स का विचार है, ख्25, उनके रहन - सहन का स्तर नीचा है, बल्कि आजकल उनके पास यही एकमात्र लाभदायक वस्तु है। यदि उनके पास करने के लिए अन्य कोई लाभकारी काम होता है तो वे छोटे टुकड़ों को भी तरजीह न देते। इसलिए यह समझना आसान हो जाता है कि छोटे खेत जमीन पर भारी दबाव के कारण नजर आते हैं।
हमारी खेतिहर जनता यद्यपि छोटे से खेत पर भी पैदावार के काम में अधिक से अधिक लगना चाहती है, तथापि जेम्स कैर्ड के अनुसार यह बात सच है कि उनमें से बड़ा भाग निश्चित रूप से निठल्ला रहेगा ही। निठल्ले मजदूर ओर ठिल्ली पूंजी में एक बहुत महत्वपूर्ण अंतर होता है। पूंजी होती है, परंतु मजदूर रहता है। अर्थात् जब पूंजी निठल्ली हो तो वह कमाती नहीं, परंतु वह कुछ खाती नहीं। परंतु मजदूर कमाए चाहे न कमाए, पर वह जीवित रहने के लिए खाता अवश्य है। इसलिए निठल्ला मजदूर एक बहुत बड़ी मुसीबत या विपत्ति बन जाता है। यदि वह उत्पादन पर निर्भर नहीं रहता तो
- प्रासंगिक उद्धरण - (पिछली पुस्तक - आमुख)। प्रो. जेवन्स अपने पाठकों पर यह प्रभाव छोड़ते हैं कि कृषि
की बुराइयां रहन - सहन के निम्न स्तर के कारण हैं। ऊंचा जीवन - स्तर स्थापित होने पर बड़ी जोतों का होना
आवश्यक हो जाएगा, क्योंकि ऊंचे जीवन - स्तर वाले व्यक्ति छोटी जोत स्वीकार करने की जगह बाहर जाना
पसंद करेंगे। उनका इस तर्क से कि जोतों और जीवन - स्तर का एक - दूसरे से संबंध है, कई कम विचारशील
पाठक भ्रमित हो सकते हैं। इसलिए इस पर टिप्पणी करना आवश्यक है। जीवन - स्तर उपभोग का स्तर होता
है, जो हमारी आदत में शामिल होता है। किंतु उपभोग के स्तर की गहराई किस पर निर्भर करती है? निस्संदेह
उत्पादन के स्तर पर। हम इस कथन की सच्चाई कर सकते हैं कि जीवन - स्तर ऊंचा होने से उत्पादन बढ़ाने
के लिए प्रोत्साहन मिलता है, किन्तु यह मानना बेवकूफी होगी कि केवल इच्छा करने से ही काम हो जाएगा।
केवल वास्तविक उत्पादन ही जीवन - स्तर ऊंचा उठाने में सहायक होता है, न कि केवल उसकी इच्छा जो
कि ‘यात्रा या शिक्षा’ के कारण पैदा हो जाती है। यदि प्रो. केवन्स का तात्पर्य यह है कि उत्पादन बढ़ाने के
अवसर से जीवन - स्तर ऊंचा हो जाएगा और इसलिए लोग छोटी जोतें पसंद नहीं करेंगे तो इसमें हम प्रो.
जेवन्स से सहमत हैं, यदि वह जीवन स्तर की बात छोड़कर केवल अधिक उत्पादन की बात करें। किंतु यदि
वह जीवन - स्तर का तर्क छोड़कर बात करें तो वह ज्यादा समझ में आएगी। यह बात लोग स्वीकार करेंगे कि
उत्पादन बढ़ने से जीवन - स्तर सुधरता है। किंतु इसका ठीक उल्टा नहीं हो सकता, यद्यपि प्रो. जेवन्स ऐसा
मानते हैं, क्योंकि उससे या तो उत्पादन होता है या परभक्षण। बिना उत्पादन बढ़ाने की चर्चा किए जीवन - स्तर
को ऊंचा उठाने की चर्चा से यदि गड़बड़ नहीं होती तो यह महज एक कामना हो सकती है।