5. भारत में छोटी जोतों की समस्या और उसका निवारण - Page 271

254 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय

उसका परिश्रमी बनना अनिवार्य हो जाता है। निठल्ला मजदूर एक नासूर की तरह होता है, जो देश की महत्वपूर्ण वस्तुएं चट कर जाता है। वह हमारे राष्ट्रीय लाभांश में वृद्धि करने की जगह जो कुछ थोड़ा - बहुत लाभांश होता भी है, उसे भी नष्ट कर जाता है। इसलिए निठल्ले मजदूर का एक महत्वपूर्ण असर होता है - राष्ट्रीय लाभांश का ह्रास। व्यक्ति की तरह समाज की आय भी किए गये प्रयासों और उपलब्ध माल पर निर्भर करती है। यह बड़े आराम से कहा जा सकता है कि किसी व्यक्ति या समाज की आय तो चालू मजदूरी से मिलती है अथवा पहले से हासिल की गई उत्पादक वस्तुओं के स्वामित्व से। आज समाज के पास जो कुछ होता है, वह या तो आज ही प्राप्त वस्तुओं पर या पिछले उत्पाद पर निर्भर करता है। इस कसौटी के आधार पर हमारे समाज का एक बड़ा भाग वर्तमान में बहुत कम प्रयास करता है और न ही उसके स्वामित्व में बहुत सारी वस्तुएं होती हैं, जिन पर वह निर्भर रह सके। निस्संदेह यह स्पष्ट है कि हमारे आर्थिक संगठन को पूंजी की आवश्यकता है। पूंजी स्पष्ट तथा बेशी या अधिक होती है और यह आधिक्य हमारे प्रयासों की आय पर निर्भर करता है। परंतु जहां प्रयास नहीं होता, वहां न आय होती है, न आधिक्य होता है और न पूंजी।

इस तरह हमने स्पष्ट कर दिया है कि हमारी खराब सामाजिक अर्थव्यवस्था ही हमारी कृषि की बुराइयों की जिम्मेदार है। हमने यह भी सिद्ध कर दिया है कि किस तरह खेती पर पूरी तरह निर्भर रहने के कारण ही जोतें छोटी - छोटी और बिखरी हुई हो गई हैं। यह भी स्पष्ट कर दिया गया है कि किस तरह हमारी जनता के बड़े भाग को कृषि उत्पादक रोजगार नहीं दे सकती और इसलिए उन्हें निठल्ला रहना पड़ता है। हमने यह भी दर्शाया है कि इन निठल्ले श्रमिकों के कारण हमारा देश बिना पूंजी का हो गया है। समस्या के हमारे इस विश्लेषण के बाद यह समझना सरल हो गया है कि वर्तमान सामाजिक अर्थव्यवस्था में चकबंदी करने और जोतों का आकार बड़ा करने के प्रयास निश्चित रूप से असफल सिद्ध होंगे।

जो लोग यह समझते हैं कि छोटी जोतें ही मूल बुराई है, स्वभावतः वे जोतों का आकार बड़ा करने का समर्थन करते हैं। परंतु इस प्रकार का अर्थशास्त्र दोषपूर्ण है और जैसा कि थामस आर्नोल्ड ने एक बार कहा था, ‘एक त्रुटिपूर्ण राजनीतिक अर्थव्यवस्था अपराध की सफल जननी होती है।’ इस बात के अतिरिक्त कि जोत का आकार बड़ा करने से वह लाभकारी नहीं हो जाती, जोतों का आकार कृत्रिम ढंग से बड़ा करने से कई सामाजिक बुराइयां भी पैदा हो जाएंगी। भविष्य में भूमिहीन और जमीन से बेदखल लोगों की सेना न तो व्यक्ति को प्रसन्न रख सकेगी और न ही राष्ट्रीय दृष्टि से इसे सहमति मिल सकेगी। परंतु यदि हम वर्तमान जोतों का आकार बड़ा भी कर दें और उन्हें लाभकारी बनाने के लिए पर्याप्त पूंजी और पूंजीगत सामान भी प्राप्त कर लें, तो भी हम न केवल सही हल नहीं बता रहे होंगे, बलिक निठल्ले श्रमिकों की संख्या बढ़ाकर एक सामाजिक बुराई को बढ़ावा दे रहे होंगे, क्योंकि पूंजी - प्रधान कृषि में उतने व्यक्तियों की जरूरत नहीं पड़ेगी, जितनी वर्तमान तरीकों से खेती करने में पड़ती है।