5. भारत में छोटी जोतों की समस्या और उसका निवारण - Page 273

256 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय

होगा। परंतु यदि स्टॉक कम होने पर भी उप - विभाजन की अनुमति न दी जाए, तो उससे अलाभकारी स्थिति पैदा हो जाएगी, जो वांछित लक्ष्य के परिणाम से बिल्कुल उल्टा होगा। यदि आर्थिक परिस्थितियों के कारण आवश्यक हुआ तो कानूनी दृष्टि से उप - विभाजन रोकने का मतलब यही होगा कि वह वास्तव में भी रुक जाएगा। यह मानते हुए कि जमीन पर जनसंख्या का भारी दबाव है और कृषि उपकरणों की संख्या बहुत कम है तथा इन बुराइयों पर चकबंदी और बड़े आकार के पक्षधर लेखकों ने कोई ध्यान नहीं दिया है, तो हमें जोतों के उप - विभाजन पर ध्यान देना पड़ेगा। यदि इस अपरिहार्य प्रवृत्ति के बावजूद हम कानून बनाएं और अपने सर्वे रिकार्ड पर सर्वे नंबर प्राप्त करने के लिए एक निश्चित सीमित आकार से कम की जोतों का रिकार्ड न करें, तो न केवल हम उस रोग का उपचार नहीं कर पाएंगे, जो इस उपाय से हो भी नहीं सकता, बल्कि उससे एक ऐसा रजिस्टर भी तैयार हो जाएगा जो सच्ची परिस्थितियों की जगह झूठी जानकारी देगा।

उप - विभाजन और विखंडीकरण रोकने के तरीकों की हमारी इस आलोचना के बाद हम चकबंदी परियोजना के बारे में अपने विचार देंगे। चकबंदी और उसका संरक्षण एक - दूसरे से इतने जुड़े हुए हैं कि एक के बिना दूसरे के बारे में सोवचा भी नहीं जा सकता। अब यदि हम चकबंदी वाली भूमि के आकार को बचाकर नहीं रख सकते, तो क्या चकबंदी करने का कोई भी फायदा है? जब तक हम अपनी सामाजिक अर्थव्यवस्था में प्रभावकारी परिवर्तन नहीं करेंगे, तब तक हमें यह प्रक्रिया अनगिनत बार दोहरानी पड़ेगी।

चकबंदी और जोतों का आकार बढ़ाने से फालतू और निठल्ले मजदूरों की समस्या और ज्यादा विकट हो जाएगी, जिससे उसकी हानियां उसके लाभों से अधिक होने की संभावना है और इसीलिए प्रो. गिलबर्ट स्लेटर ने इसका अधिक समर्थन नहीं किया। ख्26,

प्रो. स्लेटर के इस मत के विपरीत हमारा विचार है कि इन बुराइयों को दूर किया जा सकता है और क्योंकि हम उन्हें दूर करने को उत्सुक हैं, इसलिए हम जोतों का आकार बढ़ाने के लिए विभिन्न उपाय सूझाना चाहते हैं। फलतः हम यह कहना चाहते हैं कि हमारे प्रयास निठल्ले श्रमिकों की समस्या को हल करने की दिशा में होने चाहिएं। ख्27,

  1. द विलेज इन द मेल्टिंग पाट, जर्नल आफ द इंडियन इकोनोमिक सोसायटी, खंड 1, नंबर 1, पृष्ठ 10
  2. प्रो. जेवन्स यह कहते हैं कि फालतू खेतिहर जनता को नगरों में ले जाया जाए। इस लेखक को खुशी है कि प्रो. जेवन्स ने फालतू या सरप्लस मजदूरों की समस्या को स्वीकार किया है, पर जो बात वह नहीं समझा सके, वह यह है कि यह बुराई उन सभी बुराइयों की जड़ में है, जिनसे हमारी कृषि पीडि़त है। जब इस बात पर ध्यान जाता है कि प्रो. जेवन्स भारत के औद्योगीकरण के विरुद्ध अपनी पूरी विद्वता और प्रभाव का उपयोग करते हुए तर्क देने में कभी नहीं चूकते, तब फालतू श्रमिकों को नगरों में भेजने की उनकी बात विचित्र लगती है, क्योंकि नगरों की ओर पलायन भारत के लिए औद्योगीकरण की कड़ी बात को मधुर भाषा में कहना है। दूसरी ओर प्रो. जेवन्स यह भूल जाते हैं कि भारत में भी थोड़े से ही नगर हैं। यदि हम यह मान लें कि जैसा कि प्रो. जेवन्स मानते हैं कि भारत में फालतू लोगों की समस्या है, तो इसका एकमात्र तर्कसंगत और अपरिहार्य निष्कर्ष, भले ही वह कितना ही अरुचिकर क्यों न हो, यह है कि अधिक नगर स्थापित किए जाएं, अर्थात् औद्योगीकरण किया जाए।