श्री रसल की दृष्टि में सामाजिक पुनर्निर्माण 265
सर्वप्रथम यह बताना ही पड़ेगा कि चूंकि उनकी पुस्तक में युद्ध का विरोध किया गया है, अतः जो लोग उनकी कृति में निष्क्रियतावादी दर्शन की आशा करते हैं, वे पूर्णतः गलत हैं। उसका कारण है। भले ही श्री रसल युद्ध के उन्मूलन के लिए चिंतातुर हैं, पर वह स्पष्ट शब्दों में कहते हैं, ‘युद्ध को जन्म देने वाले आवेगों ने जो तबाही की है, उसके बावजूद इन आवेगों वाले राष्ट्र से अधिक आशा की जा सकती है, बजाए उस राष्ट्र के जिसमें ये आवेग हों ही नहीं। आवेग जीवन का लक्षण है और जहां यह लक्षण होता है, वहां आशा की जा सकती है कि वह मृत्यु की बजाए जीवन की ओर मुड़ेगा। लेकिन आवेग का अभाव मृत्यु है और मृत्यु में से कोई नवजीवन कहां से आएगा।’ ख्6, वह स्वीकार करते हैं, ‘जो आवेग आज राष्ट्रों को युद्ध के लिए प्रेरित करते हैं, वे स्वमेव किसी भी सशक्त अथवा प्रगतिशील जीवन के लिए अत्यावश्यक हैं। जिस समाज में जोखिम के प्रति अनुरक्ति नहीं होती, वह जड़ हो जाता है और उसका ”ास होने लगता है। संघर्ष यदि विनाशकारी तथा बर्बरतापूर्ण न हो तो आवश्यक होता है। तभी मानव की गतिविधियों में तेजी आती है और वह मृतप्रायः तथा कोरी परंपरा के चुंगल से निकलने में सफल हो पाता है। अपने ध्येय की पूर्ति की चाह, मानवों की वृहत् संस्थाओं से एकजुट होने की संभावना, ऐसी भावनाएं हैं जिन्हें कोई भी बुद्धिमान व्यक्ति नष्ट नहीं होने देगा। बुराई केवल उसी बात में है, जिसके कारण मर्मांतक मौत, मारकाट और मनोमालिन्य हो। समस्या यह है कि इन आवेगों को इस प्रकार सहज व समेटकर रखा जाए कि वे उक्त बुराई का साधन न बनें।’ ख्7,
इस सबका सार यह है कि उन्नति के लिए उद्यम अनिवार्य है। यदि आगे बढ़ना है तो हाथ - पैर हिलाने ही पड़ेंगे। इस बात पर बल देना होगा कि श्री रसल युद्ध का तो विरोध करते हैं, पर वह निष्क्रियतावाद के भी पक्षधर नहीं हैं, क्योंकि उनके अनुसार पुरुषार्थ प्रगति की ओर ले जाता है और निष्क्रियता मृत्यु की ओर। प्रोफेसर डेवी के शब्दों में वह केवल हिंसा के रूप में बल प्रयोग का विरोध करते हैं, पर ऊर्जा के रूप में बल प्रयोग का वह पूर्ण समर्थन करते हैं। जो लोग बल प्रयोग का विरोध करते हैं, उन्हें यह याद रखना ही पड़ेगा कि बल प्रयोग के बिना सभी आर्दश उसी प्रकार कोरे आदर्श रह जाएंगे, जिस प्रकार किसी सचेत अथवा अचेत आदर्श अथवा प्रयोजन के बिना संपूर्ण पुरुषार्थ केवल वज्रमूर्खता ही होगी। अतः साध्य तथा साधन (संचालन - शक्ति) काया और छाया की भांति एक - दूसरे से जुड़े हैं। साध्य साधन का औचित्य सिद्ध करता है, इस लोकोक्ति में एक ऐसा अति गहन सत्य निहित है, जिसे केवल इसलिए विकृत किया जाता है कि उसे गलत समझा जाता है। यदि साध्य साधन का औचित्य सिद्ध नहीं करेगा तो और कौन करेगा? कठिनाई यह है कि किसी साध्य को सिद्ध करने के लिए एक बार जिन साधनों का हम प्रयोग करते हैं, उनके संचालन पर हम पर्याप्त नियंत्रण नहीं रख पाते। कारण यह है कि एक बार जब हम किन्हीं
प्रिंसिपल्स ऑफ सोशल रिकंस्ट्रक्शन, पृ. 21
वही, पृ. 93