266 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
साधनों का प्रयोग करते हैं तो वे उनके साध्यों का प्रस्फुटन करते हैं। केवल हमारे मनचाहे साध्य का प्रस्फुटन नहीं होता। इस तथ्य को हम कभी - कभार ही स्वीकार करते हैं। किंतु साध्य सिद्धि के अपने उन्माद में हम अपने मनचाहे साध्य को ही रेखांकित करते हैं और इन अन्य साध्यों की ओर ध्यान नहीं देते, जो उसके साथ - साथ प्रस्फुटित होते हैं। निश्चय ही व्यवहार - प्रधान जीवन की अनिवार्य अपेक्षाओं के लिए किसी एक साध्य को सर्वोपरि महत्व देना ही होगा, पर ऐसा करते समय हमें यह सावधानी बरतनी पड़ेगी कि अन्य साध्यों की बलि न चढ़ाई जाए। अतः समस्या यह है कि किसी चीज की प्राप्ति के लिए यदि हमें बल प्रयोग करना ही हो, तो हमें देखना होगा कि किसी साध्य के लिए प्रयास करते - करते हम उन अन्य साध्यों को नष्ट कर दें, जिन्हें बनाए रखना उतना ही आवश्यक है। वर्तमान युद्ध पर इसे लागू करते समय मेरा विचार है कि बल प्रयोग का औचित्य सिद्ध करने की कोई आवश्यकता नहीं है। आवश्यकता केवल विनाशकारी हिंसा का औचित्य सिद्ध करने की है। औचित्य ऐसा होना ही चाहिए कि संसार संतुष्ट हो जाए कि किसी एक अथवा दूसरे पक्ष ने जिन साध्यों को प्रमखता प्रदान की है, वे हिंसा के अलावा किसी अन्य साधन से प्राप्त नहीं किए जा सकते थे। अर्थात् संसार की स्थिरता के लिए उतने ही आवश्यक अन्य साधनों की बलि नहीं दी गई है। काफी हद तक यह सच है कि सदा - सर्वदा हिंसा को नहीं टाला जा सकता और अप्रतिरोध को तभी अपनाया जा सकता, है जब वह प्रतिरोध का कोई बेहतर तरीका हो। लेकिन बल प्रयोग पर बुद्धिमत्तापूर्ण अंकुश रखने का दायित्व हम सभी पर है। संक्षेप में, बात यह है कि किसी चीज की प्राप्ति के लिए हमें बल प्रयोग करना ही पड़ेगा। केवल देखना यह होगा कि हम ऊर्जा के रूप में उसका रचनात्मक उपयोग करें, न कि हिंसा के रूप में विनाशकारी दुरुपयोग।
जिस रूप में प्रगति के सिद्धांत युद्ध के दर्शन से जुड़े हैं, उस रूप में उसकी चर्चा के विस्तार के औचित्य को, यदि जरूरी हो तो, प्रतीमान दोष को कम करने वाली एक से अधिक परिस्थितियों द्वारा सिद्ध किया जा सकता है। वर्तमान यूरोपीय युद्ध के कारण बल प्रयोग के दर्शन की काफी तथा अनर्गल निंदा हुई है। उसके फलस्वरूप निष्क्रियतावाद (शांतिवाद) तथा अप्रतिरोध सिद्धांत उभरकर सामने आया है। यह एक तथ्य है कि श्री रसल की पुस्तक में युद्ध का विरोध किया गया है और उसके लेखक को छह माह की जेल की सजा भुगतनी पड़ी थी। उसका कारण यह नहीं था कि उसने समीक्षाधीन पुस्तक की रचना की थी, बल्कि यह था कि उसे शांतिवादी सनकी ठहराया गया था। इस तथ्य का यह अर्थ लगाया जाएगा कि वह युद्ध की विभीषिका की स्वाभाविक प्रतिक्रिया के रूप में अनेक लोगों के मन में उपजी तथा प्रच्छन्न रूप से बैठी निष्क्रियता की इच्छा को बल प्रदान करती है। अतः यह जरूरी है कि यह जाना जाए कि बल प्रयोग की निंदा में श्री रसल की कितनी भागीदारी है। औचित्य सिद्ध करने वाली एक अन्य परिस्थिति यह है कि रसल के प्रति भारतीय पाठकों के मानस में पूर्वग्रह है। यह अनुभव करना होगा कि बल