6. श्री रसल की दृष्टि में सामाजिक पुनर्निर्माण - Page 284

श्री रसल की दृष्टि में सामाजिक पुनर्निर्माण

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प्रयोग के दर्शन के स्थान पर जिस दर्शन को बिठाए जाने की दलील दी जाती है, वह सारतः एवं अनिवार्यतः पूरब का दर्शन है, या स्पष्टतः कहा जाए तो भारतीय दर्शन है।

अतः यह और भी अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है कि भारत के पाठकों के सम्मुख श्री रसल की छवि उनके दृष्टिकोण की सही व्याख्या के साथ प्रस्तुत की जाए। इन पाठकों के मन में शांतिमय जीवन की स्वजनति इच्छा है। अप्रतिरोध के सिद्धांत के प्रति उनका दार्शनिक झुकाव है। मेरा विचार है कि यदि उन्हें सचेत न किया गया तो वे जीवन के प्रति अपने दृष्टिकोण के औचित्य को श्री रसल की रचनाओं में खोजने लगेंगे।

जीवन के प्रति भारतीय दृष्टिकोण क्या व्यवहार योग्य दृष्टिकोण है? ईसाईयत के बारे में नीत्शे ने अपनी सनक में कहा है कि केवल एक ही ईसाई था और उसे क्रास पर टांग दिया गया था। उसका आशय यह है कि जीवन के प्रति मसीही दृष्टिकोण व्यावहारिक नहीं है। यह टिप्पणी यदि ईसाईयत के बारे में खरी है तो वह जीवन के प्रति भारतीय दृष्टिकोण के बारे में बहुत कुछ खरी होनी चाहिए। भले ही प्रदेश की दृष्टि से ‘ईसाईयत’ पश्चिम की है, पर जहां तक उसके उद्गम तथा सारतत्व का संबंध है, वह सारतः पूरब की है। भले ही इतना कटु न हो, पर उपरोक्त जैसा ही निंदात्मक दृष्टिकोण श्री रसल का निष्क्रियतावाद के दर्शन के बारे में है। लेकिन खेद का विषय है कि भारतीय इस दृष्टिकोण से चिपके हुए हैं। उन्होंने कभी सोचा व समझा ही नहीं कि सिद्धांत रूप में वह संभव नहीं है। न ही उन्होंने देश में हुए अनेक उतार - चढ़ावों की ओर ध्यान दिया। इसके विपरीत आजकल भारतीय राष्ट्रवाद का बोलबाला है। अति खेद का विषय है कि वह इस प्रकार से सब भारतीय वस्तु का औचित्य सिद्ध करता है। हो सकता है कि ऐसे वातावरण में इसा दृष्टिकोण को मान्यता दी जाए और वह चलता रहे। ध्यान दें कि पूर्व तथा पश्चिम के बीच घोर विरोधाभास हैं, भले ही युद्ध के कारण वे कुछ मंद हो गए हों, फिर भी पूरब सदा ही आतुर रहता है कि वह अपनी आवश्यकता के तुष्टिकरण में इस विरोधाभास को प्रमुखता दे कि वह युद्ध और विनाश को जन्म देने वाले पश्चिम के अति भौतिकतावाद से मुक्त है। लेकिन पश्चिम पर ऐसे क्रूर विरोधाभास के आरोपण का कोई औचित्य नहीं है। पूरब बड़े मजे से यह भूल जाता है कि भौतिकवादी तो हम सभी हैं। स्वयं पूरब की इसका अपवाद नहीं है। जहां तक युद्ध का संबंध है, संभवतः पश्चिम को दोषी ठहराया जा सकता है। लेकिन पश्चिम भी पलटकर गुर्राकर कह सकता है, ‘अकर्मण्य तो मृत जैसा होता है। कर्मठता जीवन है। युद्ध जैसी उग्रता के साथ कर्म करना कहीं बेहतर है, बजाए इसके कि निठल्लों की भांति हाथ पर हाथ रखकर बैठ जाएं; जब हम कर्म करेंगे, केवल तभी हम सुचारु रूप से कर्म करने की आशा कर सकते हैं।’ इस प्रकार भले ही अचरज की बात लगे, शांतिवादी श्री रसल युद्ध को भी कर्मठता का लक्षण और उसे व्यक्ति की प्रगति का साधन मानते हैं, पर केवल इस कारण उसकी निंदा करते हैं कि वह मौत और तबाही का साधन बनता है। वह युद्ध के सौम्य रूपों का स्वागत करना चाहेंगे, क्योंकि उनके अनुसार, ‘हां, व्यक्ति किसी न किसी प्रकार की होड़