6. श्री रसल की दृष्टि में सामाजिक पुनर्निर्माण - Page 285

268 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय

करना चाहता है, प्रतिरोध पर विजय की कोई भावना उसमें होती है, ताकि वह अनुभव कर सके कि वह अपने गुणों का उपयोग कर रहा है।’ ख्8, या यूं कहिए कि वह अनुभव करना चाहता है कि वह प्रगति कर रहा है।

जीवन के प्रति भारतीय दृष्टिकोण के पक्ष में जो अनेक तर्क किए जाते हैं, उनमें से एक यह है कि मुख्यतः यह उसके ही प्रभाव का प्रताप है कि सभी प्राचीनतम देशों में से केवल भारत का ही अस्तित्व आज तक बना व बचा रहा है। यह कथन प्रायः ऐसे लोगों के श्रीमुख से भी सुना जाता है, जिनके मत को सहजता से अस्वीकार नहीं किया जा सकता। इस कथन की प्रमाणिकता अथवा अप्रामाणिकता के पचड़े में मैं नहीं पड़ना चाहता। अस्तित्व में बने रहने की बात को मानते हुए मैं एक और महत्वपूर्ण बात कहना चाहता हूं। वह यह है कि अस्तित्व में बने रहने के अनेक तरीके हैं और उन सभी की समान रूप से प्रशंसा नहीं की जा सकती। यथा, अवसर को देखते हुए रणक्षेत्र में पीछे हटने से संभव है कि कमजोर श्रेणी के लोगों को जीवित रहने का मौका मिल जाए। हो सकता है कि नत होने या घुटने टेकने की क्षमता भी स्थिति का डटकर मुकाबला करने की भांति ही किन्हीं लोगों के जीवित रहने का शर्त बन जाए। अतः सामान्य धारणा की भांति यह स्वीकार नहीं किया जा सकता कि यदि युग - युग से किन्हीं लोगों का अस्तित्व चला आ रहा है, तो वे युग - युग से फल - फूल और सुधर रहे हैं। महत्व अस्तित्व में बने रहने का नहीं है, बल्कि अस्तित्व की गुणवत्ता और उसके स्तर का है। यदि श्री रसल की रचनाओं के भारतीय पाठक अपने अस्तित्व के स्तर पर दृष्टि डालें और केवल अस्तित्व में ही बने रहने से संतुष्ट न हो जाएं, तो मुझे पूरा विश्वास है कि उन्हें निश्चित रूप से अपने जीवन मूल्यों के पुनर्मूल्यांकन की आवश्यकता दीख पड़ेगी।

यह तो हुई युद्ध के दर्शन के बारे में श्री रसल के दृष्टिकोण की चर्चा। आइए अब हम संपत्ति के प्रभावों के बारे में उनके विश्लेषण पर विचार करें। श्री रसल अपनी समीक्षा के दौरान समाज के विभिन्न वर्तमान आर्थिक संगठनों, उनसे प्रस्तुत सामाजिक बुराइयों और उन्हें दूर करने के उपायों का उल्लेख करते हैं। प्रस्तुत है, उन्हीं के शब्दों में उनकी आलोचना का सार :

वर्तमान व्यवस्था की बुराइयों की जड़ उपभोक्ता, उत्पादक तथा पूंजीपति के

अनेक हितों के बीच का अलगाव है। इन तीनों में से प्रत्येक का न तो समुदाय

के रूप में अथवा किसी एक का अन्य दो के साथ कोई समान हित है। सहकारी

व्यवस्था उपभोक्ता और पूंजीपति के हितों का समन्वय करती है; संघाधिपत्यवाद

(सिंडीकैलिज्म) उत्पादक तथा पूंजीपति के हितों का समन्वय करेगा। कोई भी तीनों

के हितों का समन्वय नहीं करता अथवा उद्योग - संचालकों के हितों का तादात्मय

समुदाय के हितों के साथ नहीं करता। अतः उनमें से कोई भी औद्योगिक संघर्ष

का पूर्ण निवारण नहीं कर सकता अथवा मध्यस्थ के रूप में राज्य की आवश्यकता

  1. प्रिंसिपल्स ऑफ सोशल रिकंस्ट्रक्शन, पृ. 96