श्री रसल की दृष्टि में सामाजिक पुनर्निर्माण 269
को नहीं टाल सकता। लेकिन उनमें से कोई भी वर्तमान व्यवस्था से बेहतर होगा
और संभवतः दोनों का मिश्रण वर्तमान उद्योगवाद की अधिकांश बुराइयों को दूर कर
सकेगा। कैसी अचरज की बात है। जहां पुरुष एवं महिलाओं ने राजनीतिक लोकतंत्र
प्राप्त करने के लिए संघर्ष किया है, पर उद्योग में लोकतंत्र लाने के लिए कुछ भी
नहीं किया है। मेरे विचार में औद्योगिक लोकतंत्र के अपार लाभ हो सकते हैं, यदि
या तो सहकारी आदर्श को अपना लिया जाए अथवा प्रशासन के प्रयोजन के लिए
किसी व्यापार अथवा उद्योग को इकाई के रूप में मान्यता दे दी जाए और किसी
प्रकार का वैसा ‘स्वशासन’ प्रदान किया जाए, जैसा कि संघाधिपत्यवाद (सिंडीकैलिज्म)
प्राप्त करना चाहता है। ऐसा कोई कारण नहीं है कि सभी ‘प्रशासनिक’ इकाइयां
भौगोलिक इकाइयां हों। यह व्यवस्था पहले जरूरी नहीं है। यदि ऐसी कोई व्यवस्था
हो जाए तो अनेक लोग अपने धंधों पर पुनः गर्व करने लगेंगे और एक बार फिर उस
सृजनात्मक आवेग के लिए मार्ग खुल जाएगा, जो आज चंद सौभाग्यशाली लोगों को
छोड़कर शेष सभी के लिए बंद है। ऐसी व्यवस्था की अपेक्षा है कि भूस्वामी समाप्त
हों और पूंजीपति पर अंकुश लगे, लेकिन वह अर्जन की समानता नहीं चाहती। और
‘समाजवाद’ की भांति वह कोई जड़ अथवा अंतिम व्यवस्था नहीं है। वह तो एक प्रकार
से शक्ति तथा पहलकदमी के लिए ढांचा मात्र है। मेरा विचार है कि किसी ऐसे ही
उपाय से व्यक्ति की अबाध प्रगति का तालमेल उन विशाल तकनीकी संगठनों से किया
जा सकता है, जिन्हें उद्योगवाद ने आवश्यक बना दिया है। ख्9,
औद्योगिक व्यवस्था के बारे में प्रायः यह आलोचना की जाती है कि वह खंडों में बंटे नैतिक आचरण को बढ़ावा देती है, वह व्यक्तित्व को बौना तथा श्रमिकों को दास बनाती है। ऐसा कोई अंजाम न निकले, इसके लिए श्री रसल आर्थिक संस्थाओं के सामाजिक प्रभावों के बारे में सतर्कता की भावना, दृष्टिकोण की व्यापकता तथा दार्शनिक पकड़ प्रस्तुत करते हैं। मेरी इच्छा है कि काश! संपत्ति के मानसिक प्रभावों के उनके विश्लेषण के बारे में भी वैसा ही कहा जा सकता। लेकिन संपत्ति के इस पक्ष से संबंधित उनकी चर्चा में कतिपय प्रत्यक्ष मिथ्या धारणाएं पाई जाती हैं। उन्हें उजागर करना जरूरी है।
पहली मिथ्या धारणा ‘धन - लोलुपता’ संबंधी कथन के दामन में लिपटी हुई है। इसमें कहा गया है, ‘उसके जाल में फंसकर मानव सफलता संबंधी मिथ्या धारणा गढ़ लेता है और अपने उद्योगों का गुणगान करने लगता है, जो मानव - कल्याण में रत्तीभर भी सहयोग नहीं देते। वह स्वभाव तथा प्रयोजन की एक निष्प्राण एकरूपता को बढ़ावा देती है। वह जीवन के उल्लास का ”्रास करती है। वह ऐसा तनाव व दबाव पैदा करती है कि पूरा का पूरा समाज शिथिल, हतोत्साहित तथा भ्रमित हो जाता है। ख्10,
प्रिंसिपल्स ऑफ सोशल रिकंस्ट्रक्शन पृ. 141 - 42
वही, पृ. 113