270 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
इस मनोभाव से पुरातनता की बू आती है और इसे कभी संभवतः औचित्य के साथ जीवन के मूल दर्शन की घुट्टी के रूप में पिलाया जाता था। ख्11,
जैसा कि आमतौर पर समझा जाता है, उससे कहीं अधिक घनिष्ठता के साथ किसी समाज के आर्थिक जीवन और दार्शनिक दृष्टिकोण आपस में जुउ़े हैं और यदि उसके ऊपर से उसकी अतिशयोक्तियों का छिलका उतार दिया जाए तो इतिहास की आर्थिक व्याख्या सत्य सिद्ध होगी। ‘धन - लोलुपता’ के विरुद्ध नैतिकतावादियों की यह चिर - प्रचलित शिकायत सांसारिक वस्तुओं के विरुद्ध उनकी आम शिकायत का ही एक हिस्सा है। वह इस विश्वास विशेष को पुष्ट करने वाली आर्थिक परिस्थितियों में अपना औचित्य खोजती है। यदि इसे ध्यान में रखा जाए तो आसानी से समझ में आ जाएगा कि किस कारण से ‘विपन्नों’ का खट्टे अंगूरों का दर्शन सभी विश्वासों में से अति उदार लगता है और किस कारण से वह उन चीजों के हमारे मूल्यों के ऊपर अधिकांशतः मंडराता रहता है, जिन्हें हम अपने भरपूर प्रयास के बावजूद प्राप्त कर पाते हैं अथवा प्राप्त नहीं कर सकते। जब हम किसी चीज को प्राप्त नहीं कर सकते तो तर्क प्रस्तुत करते हैं कि वह प्राप्त करने योग्य नहीं है। अतः सांसारिक वस्तुओं के प्रति ‘संपन्नों’ तथा ‘विपन्नों’ के दृष्टिकोणों के बीच वैसा ही खरा अंतर है, जैसा कि निराश तथा सफल लोगों की आस्थाओं के बीच है। प्रत्येक अपनी गहन तथा सनातन नैतिकता के प्रति निष्ठा के अनुसार अपनी हर करनी के लिए उसमें औचित्य खोजता है और अपने दृष्टिकोण को आदर्श से विभूषित करता है। एक समय था, जब समूचा संसार ‘पीड़ादायी अर्थव्यवस्था’ की चक्की में पिस रहा था और अति प्राचीन - काल में ऐसा ही होता था, जब मानव - श्रम की उत्पादकता अति अल्प थी और कोई भी प्रयास उसके प्रतिफल में वृद्धि नहीं कर सकता था। संक्षेप में, जब समूचा संसार गरीबी के साए में जी रहा था, तब नैतिकतावादी के लिए यह स्वाभाविक ही था कि वह गरीबी का उपदेश झाड़े तथा सांसारिक वस्तुओं के त्याग का राग केवल इस कारण अलापे कि उन्हें प्राप्त नहीं किया जाता था। ‘पीड़ादायी अर्थव्यवस्था’ वाले समाज का विचार यह होता है कि जिस चीज को प्राप्त नहीं किया जा सकता वह बुरी ही होगी, ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार आडंबरपूर्ण दिखावटी उपयोग का आदी आनंददायी अर्थव्यवस्था’ वाला समाज सोचता है कि जो चीज सस्ती होगी, वह घटिया ही होगी। श्री रसल द्वारा धन - लोलुपता की बुराइयों की पुनरावृत्ति उसके ऐतिहासिक मूल्य को कोई दार्शनिक महत्व भी प्रदान नहीं करती है। यह मिथ्या धारणा इस कारण उपजी है कि वह धन - लोलुपता की आलोचना तो करते हैं, पर उसके प्रयोजन की छानबीन नहीं करते। मेरा आग्रह है कि स्वस्थ मानस में अमूर्त रूप में धन - लोलुपता जैसी कोई चीज होती ही नहीं। धन - लोलुपता सदैव ‘किसी चीज’ के लिए होती है और ‘उस चीज’ में निहित प्रयोजन ही उसे यश अथवा
- देखिए, जेम्स बोनार की पुस्तक फिलासु इन इट्स रिलेशन टू पोलिटिकल इकोनोमी, विशेषतः एचिलेलोरिया की पुस्तक इकोनोमिक फाउंडेशन्स ऑफ सोसायटी।