श्री रसल की दृष्टि में सामाजिक पुनर्निर्माण 271
अपयश का भागी बनाता है। यदि इसे ध्यान में रखा जाए तो व्यक्तियों के बीच ‘स्वभाव की कोई निष्प्राण एकरूपता’ नहीं हो सकती, क्योंकि भले ही वे धन - लोलुपता से प्रेरित हों, पर विभिन्न अवसरों पर उनके प्रयोजन भी भिन्न हो सकते हैं। अतः धन - लोलुपता का ध्येय भी विभिन्न रूप धारण कर सकता है।
यदि हमारे जीवन के उत्पादन - पक्ष की दृष्टि से श्री रसल का विनिबंध ढुलमुल है, तो उपयोग पक्ष की दृष्टि से तो वह एकदम धराशायी हो जाता है। यदि वास्तव में यह सिद्ध करना है कि किसी एक व्यक्ति की भूख को शांत करने से मानव - स्वभाव स्वयं को ही विकृत कर लेता है, तो हमें अपने समर्थन का आधार जीवन के उपयोग पक्ष में खोजना होगा, न कि उत्पादन पक्ष में। उपभोग के नियमों ख्12, को कौन नहीं जानता? क्या उनमें ऐसी विकृति की कोई संभावना है? हम देखेंगे कि उत्तर ‘ना’ में होगा।
ध्यान दें कि उपभोग के नियम केवल वे कतिपय निष्कर्ष हैं, जो मूल्य के उपयोगिता सिद्धांत के आर्थिक पक्ष से निकाले गए हैं। कुर्नोट, गौसेन, वालरेस मेंगर तथा जेवन्स के शास्त्रीय सिद्धांत की प्रतिक्रिया में निर्धारित यह सिद्धांत अब उपयोगिता को लक्षित वस्तु या स्थिति में निहित गुणवत्ता नहीं मानता, अपितु कहता है कि उसका आधार तो वह क्षमता है, जो मानव की इच्छाओं को तृप्त करती है। यदि ऐसा है तो किसी वस्तु की उपयोगिता तृप्ति की चाह रखने वाली इन्द्रियों की बदलती हुई स्थिति के अनुसार बदलती रहती है। यथा, भोजन हमारी सर्वाधिक प्रिय वस्तु है। वह भी हमारे लिए रुचि अथवा अरुचि का विषय हो सकती है। यदि हम भूखे होंगे तो रुचि होगी, यदि पेट जरूरत से ज्यादा भरा हो तो अरुचि होगी। अतः जैसे - जैसे तृप्ति बढ़ती जाती है, वैसे - वैसे उपयोगिता घटती जाती है। या यूं कहिए कि तृप्ति से किसी इन्द्रिय विशेष या उनके समूह को आनंद अथवा रस मिलता है। अतः इन्द्रिय को तृप्ति प्रदान करने वाली वस्तु से इन्द्रिय के नाते को जताने वाली रेखा इन्द्रिय की दशा के अनुसार विपरीत दिशा में बदलने लगती है।
यदि इस मनोवैज्ञानिक विश्लेषण के निहित अर्थों पर श्री रसल से सावधानी से विचार किया होता, तो वह निश्चय ही विचाराधीन मिथ्या धारणा के शिकार न होते। मनौवैज्ञानिक विश्लेषण वास्तव में है क्या? किस कारण किसी वस्तु की उपयोगिता शून्य अथवा नकारात्मक होने लगती है? ऐसा तब होता है, जब या तो (1) तृप्ति की प्रक्रिया में किसी बिन्दु पर इन्द्रिय विशेष अपनी मनचाही वस्तु को खाते - खाते अघाकर खीज उठती है और उससे किसी प्रकार की तृप्ति लेना बंद कर देती है, अथवा (2) एक अलग प्रकार की तृप्ति की चाह रखने वाली अन्य इन्द्रियां इस बात का हड़ताल का खड़ताल बजाने लगती हैं। कि किसी इन्द्रिय विशेष ने उनके पेट पर लात मारकर गुलछर्रे उड़ाए हैं। दूसरे दृष्टिकोण को उचित ठहराते हुए प्रो. गिडिंग्ज कहते हैं, ‘यदि किसी इन्द्रिय विशेष या इन्द्रिय समूह के चावों को पर्याप्त तृप्ति के साथ दिल खोलकर पूरा किया जाता है, तो उपेक्षित इन्द्रियां हड़ताल कर देती हैं, और
- उनकी बढि़या चर्चा के लिए देखिए, प्रो. एस. एन. पैटन की पुस्तक ए थ्योरी ऑफ कंजम्पशन।