272 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
प्रायः वह आग्रह इतना हठपूर्ण होता है कि हम विवश होकर उनकी तुष्टि के लिए प्रयास करने लगते हैं। हमारे प्रकृति की उपेक्षित इन्द्रियों की यह भूख सामान्यतः हमारी चेतना पर छा जाती है और हमारे ध्यान तथा प्रयासों को उस अवयव से विमुख कर देती है, जो अपने भोग के उचित अंश से अधिक को प्राप्त कर रही है।’ ख्13, जो दो वैकल्पिक स्पष्टीकरण दिए गए हैं, उनमें से संभवतः श्री गिडिंग्ज का स्पष्टीकरण अधिक सही है।
व्यवहारवादियों की परिकल्पना है कि समूचा इन्द्रिय तंत्र एक चेतन इकाई है। उसे ध्यान में रखते हुए मान लेना उचित है कि समूचे इन्द्रिय तंत्र की यह भूख होती है कि वह अपनी प्रत्येक इन्द्रिय के लिए समुचित और विविध प्रकार की तृप्ति चाहता है और वह उक्त प्रकार के प्रतिशोध को जन्म देगी। यही वह प्रतिरोध है, जो उपभोग की विविधता नामक नियम को मानने के लिए हमें विवश करता है। यदि यह एक तथ्य है तो फिर यह समझ पाना सरल नहीं है कि कैसे कोई एक इन्द्रिय शाश्वत चौधराहट से समूचे इन्द्रिय तंत्र को विकृत कर सकती है। इसका दूसरा पक्ष भी है। भले ही एक बार में एक ही इच्छा की पूर्ति हो, पर बारी - बारी से सभी इच्छाओं की पूर्ति होगी। अतः सौभाग्य से मानव प्रकृति का ताना - बाना ही ऐसा है कि वह एकांगी विकास का विरोध करती है और उसके इस वायदे के बारे में कोई संदेह नहीं रह जाता है कि वह अनुकूल पर्यावरण में सर्वांगीण विकास करेगी। वह विविध प्रकार की अपनी मनचाही भोजन - सामग्री को, चाहे बौद्धिक हो या आध्यात्मिक, प्राप्त कर सकेगी या नहीं, यह एक ऐसा मामला है जिस पर उसका कोई वश नहीं। यदि भोजन की विविधता के प्रभाव में वह विकृति हो जाती है तो वह समाज की भूल होगी, उसकी अपनी नहीं।
श्री रसल का एक अन्य आरोप है कि संपत्ति परिग्रह वृत्ति का साकार रूप है और वह युद्ध को जन्म देती है। हम श्री रसल से सहमत हो सकते हैं, पर यह भी कह सकते हैं कि संपत्ति के प्रभावों को फ्रेड्रिक नीत्शे ने श्री रसल की अपेक्षा कहीं बेहतर ढंग से निरखा - परखा था। इस प्रभाव का स्तर एक कथा में आ जाता है। थूसीडाइडस ने कहीं इसका जिक्र किया है। कथा इस प्रकार हैः एक किसान था। फसल काटने के बाद वह उस ढेर के पास बैठकर सोच रहा था कि वह उसे मंडी में बेचेगा तो उसे कितना लाभ होगा। वह अपने कल्पना - लोक में डूबा हुआ था कि अचानक एक डाकू वहां आ धमका। उसका स्वप्न भंग हो गया और रंचमात्र भी प्रतिशोध न करते हुए वह तुरंत अपने ढेर के बंटवारे के लिए राजी हो गया। वह कहने लगा, प्रभु, तेरी बड़ी कृपा है, तूने मुझे बचा लिया, केवल आधे भाग का ही नुकसान हुआ। उक्त बात चाहे केवल कथ्य हो या पूरा तथ्य, इसमें सत्य का ऐसा सार है जो सदा ही अनुभव नहीं किया जाता। काल के प्रवाह में मानव की उग्र प्रकृति, उसके लाभार्जन उसे किस हद तक नियंत्रित करते हैं, उसे माप व नापा नहीं जा सकता। पर इसमें कोई संदेह नहीं कि नियंत्रण होता है। नीत्शे को इसका पूर्ण ज्ञान था। अतः वह नहीं चाहते थे कि उनके ‘प्रतिमानव’ (सुपरमैन) के पास कोई संपत्ति
- डेमोक्रेसी एंड एंपायर, पृ. 19