22 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
यथासंभव अधिक से अधिक अस्पृश्य प्रवेश कर सकें। उनका दर्जा इतना घटा दिया गया है कि वे आत्मबोध ही खो बैठे हैं। मैं केवल इस बात पर जोर देना चाहता हूं कि अस्पृश्यों के प्रतिनिधित्व के बारे में निर्णय करते समय समिति अस्पृश्यों के हितों का ध्यान रखेगी और यह निर्णय देगी कि प्रतिनिधियों की संख्या निर्वाचक - मंडल के विस्तार के अनुसार न हो, बल्कि निर्वाचक - मंडल का विस्तार प्रतिनिधियों की संख्या के अनुसार हो।
इस संबंध में लार्ड मौर्ले समिति का स्मरण कराना अनुचित नहीं होगा, जिसने कहा है, ‘सरकार का उद्देश्य यह है कि विधान परिषदों में संबंधित समुदायों की वास्तविक सामाजिक शक्तियों, आशाओं तथा आकांक्षाओं का संतुलित, यथार्थ तथा प्रभावशाली प्रतिनिधित्व हो। इसे बीजगणित, गणित, रेखागणित अथवा तर्क के आधार पर नहीं, बल्कि व्यापक दृष्टिकोण के आधार पर किया जा सकता है।’ उन्होंने इस बात को स्वीकार करने में कोई आपत्ति नहीं की है कि प्रतिनिधित्व की सीमा निर्धारित करते समय मुख्यतः प्रतिनिधियों की संख्या पर ध्यान देना चाहिए, लेकिन तरमीनें प्रतिनिधियों की संख्या पर प्रभाव डाल सकती हैं। अतः प्रस्ताव है कि बंबई प्रेसिडेंसी के अस्पृश्यों को उपर्युक्त निर्वाचन - क्षेत्रों से नौ सदस्यों को चुनने की अनुमति दी जाए। ये नौ सदस्य एक और निर्वाचक - मंडल का गठन करेंगे। वे अपने बीच से एक सदस्य का निर्वाचन करेंगे और वह सदस्य इंपीरियल विधान परिषद में अस्पृश्यों का प्रतिनिधित्व करेगा। शेष आठ सदस्य बंबई विधान परिषद में अस्पृश्यों का प्रतिनिधित्व करेंगे।
साम्प्रदाय आधारित निर्वाचक - मंडलों के अलावा अस्पृश्यों के प्रतिनिधित्व के लिए अन्य योजनाएं भी हैं। यह उचित नहीं होगा कि उन योजनाओं के विषय में कुछ कहे बिना इस बयान को समाप्त किया जाए।
कांग्रेस ने केवल मुसलमानों के मामले में साम्प्रदाय आधारित प्रतिनिधित्व देना स्वीकार किया है और वह नामांकन के अंधाधुंध इस्तेमाल को भी स्वीकार नहीं करती। अतः अस्पृश्यों के लिए सिर्फ एक ही रास्ता बचा है कि वे आम निर्वाचन - क्षेत्र में चुनाव लड़ें। यह उचित होता यदि चुनाव लड़ने के लिए सभी को बराबर की आजादी मिली होती। शास्त्रों के जरिए अस्पृश्यों को स्पृश्य - समर्थक बनने की और स्पृश्यों को अस्पृश्य - विरोधी बनने की शिक्षा दी जाती है और फिर कहा जाता है कि दोनों खुला चुनाव लड़ें। यह तो मतिभ्रम अथवा चालबाजी के लक्षण हैं। लेकिन इस बात को तो याद रखना ही होगा कि कांग्रेस में अधिकतर ऐसे लोग हैं, जिनका मुखौटा तो राजनीतिक आमूल परिवर्तनवादियों का है, पर हैं वे सामाजिक रूढि़वादी। उनका सिद्धांत है कि सामाजिक तथा राजनीतिक दो अलग - अलग क्षेत्र हैं। उनका आपस में कोई संबंध नहीं है। उनकी दृष्टि में समाज तथा राजनीति के दो अलग - अलग सूट हैं और उन्हें मौसम के अनुसार अदल - बदल कर ही पहना जा सकता है। ऐसी मनोवृत्ति तो केवल हास्यास्पद है, क्योंकि यह इतनी स्वार्थपूर्ण मनोवृत्ति है कि उसकी स्वीकृति अथवा अस्वीकृति के लिए गंभीरता से विचार करने की भी जरूरत नहीं। चूंकि ऐसी मनोवृत्ति में दृढ़ विश्वास के अपने फायदे होते हैं, अतः वह सहज ही समाप्त भी नहीं होगी। कांग्रेस की गतिविधियों की शुरूआत ही इस अस्वाभाविक