साउथबरो कमेटी के समक्ष दिया गया साक्ष्य
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आधार वाक्य से हुई है, अतः उनमें यह वृत्ति रच गई है। जो लोग कांग्रेस के सम्मेलनों में भाग लेते हैं, वे उसी पंडाल में हो रही नेशनल सोशल कांफ्रेंस की उपेक्षा करते हैं। तथ्य तो यह है कि कांग्रेस सम्मेलनों में भाग लेने वालों ने एक बार यह अभियान छेड़ा था कि उस कांफ्रेंस को पंडाल के इस्तेमाल की अनुमति न दी जाए, जिसे उनकी प्रेसिडेंसी के बुद्धिजीवियों के केन्द्र पूना में पंडाल के उपयोग की अनुमति नहीं दी गई थी। कांग्रेस गैर - राष्ट्रीय अथवा राष्ट्र - विरोधी संगठन है। अतः सांप्रदाय आधारित निर्वाचक - मंडलों के बारे में उसके विचार गंभीरता से विचार योग्य नहीं हैं।
- उदारवादियों ने अपनी बैठक में न्याय की अपेक्षा उदारता का प्रदर्शन अधिक किया है। उनका प्रस्ताव था कि बहुसंख्यक निर्वाचन - क्षेत्रों में पिछड़े समुदायों के लिए सीटों का आरक्षण कर दिया जाए। उन्होंने अस्पृश्यों के लिए सीटों की संख्या नहीं बताई है। लेकिन अनेक प्रबुद्ध उदारवादियों तथा अन्य लोगों की उदार भावना यह है कि इतना पर्याप्त होगा कि विधान परिषद में अस्पृश्यों के एक या दो प्रतिनिधि चुन लिए जाएं। इन महानुभावों से सहमत होने की कोई गुंजाइश नहीं है, भले ही इस सहानुभूति के लिए उनका आभार व्यक्त किया जा सकता है। अस्पृश्यों के एक या दो प्रतिनिधियों का होना, न होने के बराबर है। विधान परिषद कोई अजायब घर तो है नहीं। उसके पास तो शक्तियां होंगी और वह समाज के भविष्य को बना अथवा बिगाड़ सकेगी। एक या दो अस्पृश्य प्रतिनिधि क्या कर सकते हैं? न तो वे अपनी दशा सुधारने के लिए किसी बिल को पास करा सकते हैं और न ही वे अपनी दशा को दयनीय बनाने वाले किसी बिल को रोक सकते हैं। साफ बात तो यह है कि उच्च जाति के सवर्ण हिन्दुओं को दी जाने वाली राजनीतिक सत्ता से अस्पृश्य अधिक कल्याण की आशा नहीं कर सकते। भले ही सत्ता का उपयोग अस्पृश्यों के विरुद्ध न किया जाए, पर इस बारे में हम पूर्णतया आश्वस्त नहीं हो सकते। यह भी तो हो सकता है कि उसका उपयोग उनकी भलाई के लिए न किया जाए। विधान परिषद पूर्ण सत्तासंपन्न हो सकती है। वह जो चाहे करे, पर वह क्या करना चाहेगी, यह उसके स्वरूप पर निर्भर करेगा। हमें निश्चित रूप से समझ लेना चाहिए कि भले ही ब्रिटिश संसद कुछ भी करने के लिए पूर्णतः समर्थ है, पर वह अपने चहेतों के अनुचित परिक्षण को अवैध नहीं ठहराएगी। भले ही सुल्तान समर्थ है पर वह मुहम्मद के धर्म में परिवर्तन नहीं कर सकता, ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार कि भले ही पोप समर्थ है, पर वह ईसा मसीह के धर्म को पलट नहीं सकता। उसी प्रकार जिस विधान - मंडल में अधिकांश उच्च जाति के लोग होंगे, वह ऐसा कानून पास नहीं करेगा जो अस्पृश्यता को मिटाए, अंतर्जातीय विवाहों की अनुमति दे, सार्वजनिक मंदिरों, स्कूलों तथा सड़कों के इस्तेमाल पर लगी रोक को दूर करे और संक्षेप में कहा जाए तो जो अस्पृश्यों के व्यक्तित्व को शुद्ध करे। इसका कारण यह नहीं है कि वे ऐसा कर नहीं सकते, बल्कि वे करेंगे नहीं। विधान - मंडल सामाजिक स्थिति की उपज है और जो समाज की स्थिति का निर्धारण करता है, वही उसकी शक्ति का भी निर्धारण करता है। यह बात इतनी साफ है कि उसका खंडन नहीं किया जा सकता। भविष्य में क्या घटना घट सकती है, उसका