24 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
अनुमान अतीत की घटना से लगाया जा सकता है। कांउसिल में उच्च जाति के लोग नहीं चाहते कि विधान - मंडल के सामने कोई सामाजिक समस्या लाई जाए। इंपीरियल विधान परिषद में 1916 में माननीय श्री दादाभाई नौरोजी ने जो संकल्प प्रस्तुत किया था, उससे यह बात स्पष्ट हो जाती है। यह सबको पता है और उसे दुहराने की जरूरत नहीं है कि जो अनेक लोग अस्पृश्यों के प्रति कुछ सहानुभूति रखते हैं, उन्होंने इसकी कटु आलोचना की। लेकिन इस बात का किसी को पता नहीं है कि यद्यपि संकल्प पास नहीं हुआ था, प्रस्तावक को माफ नहीं किया गया, क्योंकि ऐसे अप्रिय संकल्प को लाना ही पाप माना गया। बाद के चुनाव में प्रस्तावक को हटना पड़ा और उनके स्थान पर माननीय श्री
खापरडे आए, जिन्होंने एक बार एक लेख में कहा था : ‘जो अस्पृश्यों के उत्थान के लिए कार्य करते हैं, स्वयं निम्नकोटि के हैं।’
अस्पृश्यों के प्रति उच्च जाति के सवर्णों की यह सहानुभूति क्या प्रतिशोधपूर्ण सहानुभूति नहीं है?
जो यह फरमाते हैं कि अस्पृश्यों के लिए एक या दो सदस्य काफी होंगे, वे राजनीतिक हक के सही आशय को नहीं समझते। भले ही सारांश रूप में तकनीकी दृष्टि से यह कहा जाता है कि राजनीतिक हक का मुख्य आशय वोट देने का अधिकार है, पर न तो वह कानूनों के अथवा कानून बनाने वालों के पक्ष में वोट देने का अधिकार है। न तो वह किसी बिल के पक्ष या विपक्ष में बोलने का अधिकार है और न ही नाम पुकारे जाने पर हां अथवा ना कहने की योग्यता है। अनेक लिखित नामों वाले कागज के टुकड़े को मतदान पेटी में डालने की योग्यता ऐसा कार्य है जो उक्त कार्यों की भांति स्वयं कोई महत्व नहीं रखता, भले ही उस पर दिनचर्या के अनेक सर्वाधिक सामान्य कार्यों से स्वतः बेहतर होने का ठप्पा लगा दिया जाए। वे किसी अन्य कार्य की भांति शिक्षाप्रद हैं। मताधिकार अथवा राजनीतिक अधिकार का महत्व यह है कि उन शर्तों के विनियमन में सक्रिय तथा सीधी भागीदारी का अवसर दिया जाए, जिन पर सामाजिक जीवन आधारित होगा। जिन शर्तों पर आज स्पृश्यों तथा अस्पृश्यों का सामाजिक जीवन निर्भर है, वे स्पृश्यों के लिए अति अपयशकारी तथा अस्पृश्यों के लिए अति घातक है। यदि लोगों की क्षमताओं को कारगर बनाना है तो उनके प्रयोग की सामाजिक शर्तों को निश्चित करने की शक्ति होनी ही चाहिए। यदि शर्तें अत्यंत कठोर हों तो यह स्पृश्यों तथा अस्पृश्यों, दोनों के हित में होगा कि शर्तों में संशोधन किया जाए। अस्पृश्यों की ऐसी स्थिति होनी ही चाहिए कि वे संशोधन को अपने अनुकूल करा सकें। उनके हितों के महत्व को देखते हुए यथा प्रस्तावित उन्हें उनका प्रतिनिधित्व उनकी जनसंख्या के अनुपात में मिलना चाहिए। एक या दो प्रतिनिधि का होना यह प्रदर्शित करता है कि उन्हें अनुकंपा के आधार पर लिया गया है। यह न तो न्यायोचित है और न ही पर्याप्त। जैसा कि लार्ड मौर्ले के पिछले उद्धरण में कहा गया है, प्रतिनिधित्व जरूरतों के अनुसार होना चाहिए, न कि संख्या के अनुसार।
हाल ही में दलित वर्ग मिशन द्वारा अस्पृश्यों के प्रतिनिधित्व के बारे में एक विरोधी योजना कार्यान्वित की गई है। उसे सहयोजन की योजना कहा जाता है। योजना