साउथबरो कमेटी के समक्ष दिया गया साक्ष्य
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में प्रस्ताव रखा गया है कि अस्पृश्यों के प्रतिनिधियों को कांउसिल के निर्वाचित सदस्यों के सहयोजन से नामित किया जाए। यह निर्णय करना बड़ा कठिन है कि अस्पृश्यों के लिए मिशन के प्रयोजन को हास्यास्पद माना जाए या उस पर खेद प्रकट किया जाए।
खेद इस बात का है कि इस प्रकार की बेतुकी योजना प्रायः स्वीकार की जाएगी। अतः उसका उपहास करना ही ठीक है। इस योजना से आसानी से पता लगाया जा सकता है कि जिसे कभी - कभी परोपकारी हित कहा जाता है, उसका दूसरा रूप भी हो सकता है, जिसके अनुसार अस्पृश्यों को यह बताया जाता है कि उनका भला किस बात में होगा। इस संबंध में अस्पृश्यों के विचारों से सहमत होने का प्रयास नहीं किया जाता, ताकि वे अपनी भलाई की खोज कर सकें तथा उसे प्राप्त कर सकें। यह कहना होगा कि मिशन की स्थापना इस उद्देश्य से ही गई थी कि दलितों की दशा सुधारी जाए और उन्हें उच्च जाति के लोगों के सामाजिक अत्याचारों से मुक्त कराया जाए। यह मिशन इतना असफल सिद्ध हुआ कि उसे ऐसी योजना का समर्थन करना पड़ा, जिससे उसके आश्रित या उनके प्रतिनिधियों को अपने विगत आकाओं का दास बनना पड़ेगा। इस प्रकार आकाओं तथा मिशन से मिलकर एक योजना तैयार की है, जिसके अधीन दलित वर्ग सदैव पद - दलित रहेंगे और उनकी मुक्ति की कोई आशा नहीं रहेगी। ऐसे हथकंडे अस्पृश्यों को धोखा नहीं देते, जबकि वे अनभिज्ञ हैं; मताधिकार समिति को तो वे क्या धोखा दे सकेंगे। एक अन्य दृष्टि से भी मिशन की योजना स्वीकार नहीं की जा सकती। यह देखकर खेद होता है कि मिशन एक ओर तो अस्पृश्यों के प्रतिनिधित्व की योजना प्रस्तुत कर रहा है, और दूसरी ओर अपनी प्रशासी परिषद में अस्पृश्य को लेने से बराबर मना कर रहा है। चूंकि यह मिशन निहित स्वार्थों वाला एवं अनौपचारिक है, अतः उसकी योजना को अस्वीकार कर दिया जाना चाहिए।
भले ही सरकार द्वारा नामित का रूप पहले नामित के रूप से बेहतर हो, पर अस्पृश्यों की दृष्टि से इस पर आपत्ति की जा सकती है। वह प्रतिनिधियों की आजादी पर तो पाबंदी लगाता ही है, उसके साथ - साथ वह ऐसी राजनीतिक शिक्षा देने में असमर्थ है, जिसकी सभी समुदायों, विशेषकर अस्पृश्यों को तत्काल जरूरत है।
इस अवस्था में हमें साम्प्रदाय आधारित प्रतिनिधित्व के विरूद्ध दिए गए तर्क पर विचार करना ही चाहिए। रिपोर्ट तैयार करने वालों ने जो प्रथम तर्क प्रस्तुत किया है, उसका आशय है कि ‘जिन राष्ट्रों ने स्वशासन का विकास किया है, उनका इतिहास निश्चय ही संप्रदाय आधारित प्रतिनिधित्व के विरुद्ध है।’ लेकिन पिछले पृष्ठ पर रिपोर्ट तैयार करने वालों ने कहा है कि भारतीय समाज का सही चित्र उपस्थित करते समय जाति और वर्णों के अंतर को ‘ध्यान में रखना होगा, क्योंकि भारतीय समाज के विचार उन विचारों से मेल नहीं खाते, जिन पर विश्व में अन्यत्र प्रतिनिधि संस्थाएं आधारित है’ (पृ. 97)। पहली बात को लिखते समय स्थिति का बाद का विश्लेषण उनके दिमाग में नहीं रहा होगा, अन्यथा हमें कहना होगा कि संभवतः रिपोर्ट तैयार करने वालों के दिमाग में एक साथ दो परस्पर विरोधी विचार रहे होंगे। दोनों को पास - पास रखकर देखा जाए तो रिपोर्ट तैयार करने