1. मताधिकार के बारे में साउथबरो कमेटी के समक्ष दिया गया साक्ष्य - Page 43

26 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय

वालों से यह आशा करनी ही होगी कि वे एक असाधारण स्थिति का सामना करने के लिए एक असाधारण उपाय के रूप में संप्रदाय आधारित प्रतिनिधित्व के प्रति सहमत हैं।

  1. एक अन्य तथा खास तर्क संप्रदाय आधारित प्रतिनिधित्व के विरुद्ध यह है कि उसके आधार पर सामाजिक विभाजन जारी रहेगा। कैसा मजाक है कि जो लोग सामाजिक विभाजनों के पक्षधर हैं, वे ही इस प्रतिकूल तर्क के सबसे बड़े समर्थ हैं। समिति को इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि जो लोग इस आधार पर संप्रदाय आधारित प्रतिनिधित्व का विरोध करते हैं, वे ही श्री पटेल के अंतर्जातीय विवाह विधेयक के सबसे कट्टर विरोधी हैं और इसे जाति - तोड़क विधेयक मानते हैं। इस तर्क को प्रस्तुत करने वाले महानुभावों की ईमानदारी पर संदेह किया जा सकता है। लेकिन चूंकि रिपोर्ट तैयार करने वालों ने भी इसे संप्रदाय आधारित प्रतिनिधित्व के विरोध में गौण रूप में प्रस्तुत किया है, अतः यदि संभव हो तो इस तर्क का सामाधान किया जाना चाहिए।

क्या संप्रदाय आधारित प्रतिनिधित्व सामाजिक विभाजन बनाए रखेंगे? यदि आप संप्रदाय आधारित प्रतिनिधित्व को इस दृष्टि से देखें कि वह सामाजिक विभाजनों को निर्वाचक - मंडलों का रूप देता है, तो आलोचना को उचित कहा जा सकता है। यह तभी सही होगा, जब पहले से यह मान लिया जाए कि ये विभाजन कोई वास्तविक विभाजन नहीं है और उनका कोई महत्व नहीं है। यह तो वैसा ही मिथ्यापूर्ण धारणा है जैसी कि भारत को प्रलोभन देने के लिए की जाती है और कहा जाता है कि अंग्रेज तो असामाजिक हैं। संप्रदाय आधारित प्रतिनिधित्व के इस लाभ - विशेष को तो मानते हैं और उसका विरोध इस आधार पर करते हैं कि उसके कारण सामाजिक विभाजन बना रहेगा, उन्हें यह बताया जा सकता है कि एक अन्य दृष्टिकोण से यह कहा जा सकता है कि संप्रदाय आधारित प्रतिनिधित्व सामाजिक विभाजनों को जारी नहीं रखता, बल्कि वह तो उन्हें समाप्त करने का एक उपाय है।

  1. जब संप्रदाय आधारित निर्वाचक - मंडलों और सामाजिक विभाजनों का एक ही लक्ष्य होगा, तब उनका प्रमुख प्रभाव यह होगा कि अलग - अलग जातियों के जो लोग वैसे आपस में नहीं घुलते - मिलते, उन्हें वे एकजुट करके विधान परिषद में लाएंगे। इस प्रकार विधान परिषद भागीदारी का एक नया क्षेत्र बन जाएगी। उसमें विभिन्न जातियों के वे प्रतिनिधि आपस में जुड़े जाएंगे, जो अभी तक अलग - थलग थे और उसके कारण असामाजिक थे। सामुदायिक एवं सामूहिक जीवन में सक्रिय भागीदारी, भागीदारों की मनोवृत्ति एवं प्रवृत्ति पर अवश्य ही प्रभाव डालेगी। आज जाति अथवा धर्म की एक निश्चित प्रवृत्ति है। लेकिन जब तक जाति या वर्ग अलग - थलग रहेंगे, तब तक उनकी प्रवृत्ति जड़ अवस्था में रहती है। जैसे ही अनेक जातियां अथवा समूह आपस में संपर्क एवं सहयोग करने लगते हैं तो उसके फलस्वरूप जड़ प्रवृत्ति का निश्चित रूप से पुनः समाजीकरण होने लगता है। यदि मुसलमानों, ईसाइयों आदि के प्रति हिन्दुओं की प्रवृत्ति का और हिन्दुओं के प्रति मुसलमानों, ईसाइयों, आदि की प्रवृत्ति का तथा अस्पृश्यों के प्रति स्पृश्य हिन्दुओं की प्रवृत्ति का पुनः समाजीकरण हो जाए, तो जातियां और विभाजन समाप्त हो जाएंगे। यदि जाति एक प्रवृत्ति है और उसके अलावा और कुछ नहीं है तो उसे तब समाप्त हुआ माना जाएगा,