साउथबरो कमेटी के समक्ष दिया गया साक्ष्य
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जब जाति की प्रतीक प्रवृत्ति भी समाप्त हो जाएगी। लेकिन विभिन्न जातियों तथा समूहों की वर्तमान रूढि़वादी प्रवृत्ति तभी समाप्त होगी, जब विभिन्न समूह आपस में मिल - जुलकर सामूहिक गतिविधियों में हिस्सा लें। मनोवृत्ति के ये परिवर्तन क्षणभंगुर नहीं होंगे, बल्कि उनके फलस्वरूप परिषद भवन से बाहर का सामूहिक जीवन प्रभावित होगा। जितनी संख्या में ऐसी सामूहिक गतिविधियों के लिए अवसर पैदा किए जाएंगे, उतना ही अधिक अच्छा होगा। तब बड़े पैमाने पर पुनः समाजीकरण होगा और उसके फलस्वरूप और भी तेजी से जातियां और समूह समाप्त हो जाएंगे। इस प्रकार जो लोग वर्तमान विभाजन को अक्षुण्ण रखने के आधार पर संप्रदाय आधारित प्रतिनिधित्व की निंदा करते हैं, वे यदि विचार करें तो उसका स्वागत करेंगे और उसे उनके उन्मूलन के लिए एक सशक्त साधन मानेंगे।
इस बारे में दो मत नहीं हो सकते कि अस्पृश्यों के लिए पर्याप्त संप्रदाय आधारित प्रतिनिधित्व जरूरी भी है और महत्वपूर्ण भी। इस संबंध में व्यक्त अस्पृश्यों की भावनाएं कितनी प्रबल होती हैं, उसका अंदाजा सहज ही उस समय लग गया होगा, जब मद्रास प्रेसिडेंसी के अस्पृश्यों ने श्री मोंटेग्यू से कहा था कि यदि भारत के लिए स्वशासन के साथ संप्रदाय आधारित प्रतिनिधित्व को नहीं जोड़ा गया तो रक्तपात होगा। लेकिन रिपोर्ट तैयार करने वालों ने बुद्धिजीवी वर्ग के प्रति अपने मन में यह आस्था बना ली है कि वे अस्पृश्यों को स्थायी सामाजिक अधोगति तथा बहिष्कार से उबारने के लिए सभी प्रकार के सुधार लागू करवा देंगे। वे कहते हैं, ‘हमारे विचार में शिक्षित भारतीय राजनीतिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए ही नहीं, बल्कि विभिन्न प्रकार की लोक तथा समाज सेवा के भी प्रयास कर रहे हैं।’ चूंकि रिपोर्टकर्ताओं ने अस्पृश्यों की मांगों की अनदेखी की है, अतः यह पता लगाना उचित है कि क्या वे प्रमाणित निष्ठा वाले लोग थे। शिक्षा तथा उसके सामाजिक महत्व के बारे में जोसफ एडीसन के शब्दों को उद्धृत किया जा सकता है। उन्होंने कहा है : ‘मानव समाज के लिए इससे अधिक अहितकर बात और कोई नहीं होगी, जब प्रतिभाशाली व्यक्तियों का मान - सम्मान उनकी प्रतिभाओं के लिए इस तथ्य पर ध्यान दिए बिना किया जाए कि उनका प्रयोग किस प्रकार किया जाता है। प्राकृतिक देन तथा कला प्रवीणता मूल्यवान होती है, लेकिन चूंकि उन्हें गुणों के लिए काम में लाया जाता है अथवा उन पर मान - सम्मान के नियम लागू होते हैं, अतः हमें चाहिए कि निरपेक्ष भाव से देखें और अपने संपर्क में आने वाले लोगों में प्रतिभा के दर्शन इस आधार पर ही करें कि हमें उनकी मनोवृत्ति के बारे में कोई खास बात दिखी है या उसके बारे में कोई अच्छी जानकारी मिली है, अन्यथा वे हमें उन लोगों का भक्त बना देंगे, जिनके बारे में हमारा ज्ञान और विवेक कहेगा कि हमें तो उनसे घृणा करनी चाहिए थी।’
आंकड़े प्रमाण हैं कि बुद्धिजीवी वर्ग और ब्राह्मण एक - दूसरे के पर्याय हैं। बुद्धिजीवी मनोवृत्ति ब्राह्मणवादी मनोवृत्ति है। उसका दृष्टिकोण ब्राह्मणवादी दृष्टिकोण है। हालांकि वह वाणी से सर्वहित की बात करता है, पर ब्राह्मण नेता किसी प्रकार जन - नेता नहीं होता। अधिक से अधिक वह अपनी जाति का नेता होता है, क्योंकि जितनी सहानुभूति उसकी उनके लिए होती है, उतनी अन्य किसी के लिए नहीं होती। इसका यह अर्थ नहीं