28 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
है कि ऐसे ब्राह्मण हैं ही नहीं, जो अस्पृश्यों से सहानुभूति रखते हों। ठीक - ठीक कहा जाए तो कुछ ब्राह्मण काफी उदार तथा विचारवान हैं। वे स्वीकार करते हैं कि अमूर्त रूप में अस्पृश्यता की प्रथा एक राक्षसी प्रवृत्ति है और समाज को उससे गंभीर खतरा है। लेकिन अधिसंख्य हठधर्मी ब्राह्मण ऐसा नहीं सोचते। वे बड़ी अभूतपूर्व मात्रा में उपलब्ध कराए गए प्रमाण और प्रतिदिन का प्रचुर अनुभव होते हुए भी इस प्रथा के भंयकर रूप को अस्वीकार करते हैं। वे जब आजादी की बात करते हैं तो उसका अर्थ होता है कि उन्हें आजादी है कि वे अपने मानवों का दमन करें और उनके प्रति बर्बर, निर्दयी तथा क्रूर बनें। उनके मनमाने अधिकार का विकास केवल अस्पृश्यों के अहित में ही हो सकता है। उनकी भावना न तो यह सहन करेगी कि अंग्रेज लोग उनसे ऊंचे हैं और न ही यह सहन करेगी कि एक अस्पृश्य का दर्जा उनके बराबर है, और उनसे जो नीचा है उसे उनकी छाया से भी दूर रहना चाहिए। यह है उनकी सामाजिक तथा राजनीतिक मनोवृत्ति का सही सार। जो लोग ब्राह्मण नेताओं की समाज - विरोधी भावना की आलोचना करते हैं, उन्हें यह चेतावनी दी जाती है कि अपनी आलोचना में ब्राह्मण नेताओं की प्रथम श्रेणी के अस्तित्व की ओर समुचित ध्यान नहीं देते। निस्संदेह ऐसा है। उनमें व्यक्तिगत तथा आर्थिक त्याग के बहुत कम उदाहरण पाए जा सकते हैं। उसी प्रकार उनकी अस्वाभाविक शक्ति के प्रयोग में नरमी दिख सकती है। फिर भी, आंशका है कि इस अन्याय को उस स्थिति से जुदा नहीं किया जा सकता, जिससे कि मानवता तथा सच्चाई का वास्ता पड़ता है। अस्पृश्यों की दयनीय स्थिति इसलिए कुछ अधिक सहनीय नहीं हो जाती कि कुछ उदार लोग सहानुभूति दिखाएंगे ही। न ही सच्चे व न्यायोचित क्रोध की प्रतिकूल बाढ़ रुक सकती है, क्योंकि अपने प्रबल वेग में वह उन चंद लोगों को भी निगल जाएगी, जो दोषियों की भीड़ में अपेक्षाकृत निर्दोष हैं।
- भारत में राष्ट्रवाद की प्रवृत्ति हमें यह विश्वास नहीं दिलाती कि जो चंद लोग सहानुभूति रखते हैं, उनकी संख्या बढ़ेगी। दूसरी ओर निश्चय ही समय के साथ - साथ दोषियों की भीड़ बढ़ती जाएगी। राजनीतिक संघर्ष में तेजी आने से सामाजिक सुधार का संघर्ष न केवल मंद, बल्कि ठंडा ही पड़ गया है। प्रार्थना समाज, ब्रह्म समाज का उत्थानकारी प्रभाव अब अतीत का हिस्सा बन गया है। भविष्य में भी इनकी अधिक संभावना नहीं है। यदि शिक्षा का प्रचार - प्रसार केवल एक ही वर्ग तक सीमित रहा तो जरूरी नहीं कि उससे उदारवाद पनपेगा ही। इससे वर्ग हित का औचित्य तथा संरक्षण सिद्ध हो सकता है। हो सकता है कि इससे दलितों के उद्धारक एवं सुधारक पैदा न हों, बल्कि अतीत और यथास्थिति के पक्षधर एवं समर्थक पैदा हो जाएं। अब तक की शिक्षा का क्या यह प्रभाव नहीं देखा गया है? यह मान लेने का कोई आधार नहीं है कि अन्य बातें समान होते हुए भी यह भविष्य में एक नया मार्ग अपनाएगी। अतः अस्पृश्यों को उच्च जातियों के रहमो - करम पर नहीं छोड़ा जाना चाहिए, बल्कि बुद्धिमानीपूर्ण नीति तो यह होगी कि स्वयं अस्पृश्यों को शक्ति दी जाए। वे औरों की तरह सत्ता के भूखे नहीं हैं। वे तो समाज में केवल अपने सहज - स्वाभाविक स्थान के लिए आग्रह करना चाहते हैं।