साउथबरो कमेटी के समक्ष दिया गया साक्ष्य
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- इस व्यापक विश्वयुद्ध का उद्देश्य जो भी रहा हो, पर उसने आत्म - निर्णय के सिद्धांत को जन्म दिया है और वही भविष्य में अंतर्राष्ट्रीय संबंधों का आधार होगा। यह प्रसन्नता की बात है कि 20 अगस्त, 1917 की घोषणा में कहा गया है कि इस सिद्धांत को भारत पर लागू किया जाएगा। उसमें इस नियम का प्रतिपादन किया गया है कि प्रत्येक देशवासी को यह निर्णय करने का अधिकार होगा कि वे किन परिस्थितियों में रहें। यह इस सिद्धांत के महत्व की अधूरी अनुभूति का लक्षण होगा, यदि इसकी प्रयुक्ति को केवल अंतर्राष्ट्रीय संबंधों तक सीमित रखा गया, क्योंकि मतभेद केवल राष्ट्रों के बीच ही नहीं होते हैं, बल्कि किसी देश के वर्गों के बीच भी होते हैं। हमारे भारतीय राजनेता अपने राजनीतिक तथा जोशीले भाषणों में जान - बूझकर भारत के लोगों की कानूनी संकल्पना का राग अलापते हैं। कानूनी संकल्पना में भारत के लोगों का ऐसा चित्र खींचते हैं मानो भारत के लोगों का स्वभाव एक - सा है। वे इन गुणों पर बल देते हैं, यथा प्रयोजन और कल्याण का प्रशंसनीय समुदाय, लोकहित के प्रति निष्ठा, इस एकता से जुड़ी परस्पर सहानुभूति। आशा है कि समिति इस बात का अनुभव अवश्य करेगी कि कानूनी तथा वास्तविक संकल्पनाएं किस प्रकार टकराती हैं। उदाहरण के लिए निम्नलिखित पर ध्यान दिया जा सकता है। अंग्रेजों ने भारत के लोगों पर विजय प्राप्त करके उन्हें गुलाम बनाया, यह अनैतिक बुराई ब्राह्मण राजनेताओं के लिए अतिप्रिय विषय है। वे कभी उससे लाभ उठाने से नहीं चूकते। इन अनैतिकताओं का चित्रण जान शोर ने एक बार अपने 1832 में लिखे नोट्स आन इंडियन अफेयर्स (भारतीय मामलों संबंधी टिप्पण) में किया था। स्वर्गीय माननीय श्री गोखले ने भी एक बार इसी भावना को व्यक्त किया था। तब वह ‘विदेशी एजेंसी बड़ी महंगी है’ विषय पर बोल रहे थे। उन्होंने कहा था :
अनैतिक बुराई सबसे बढ़कर होती है। वर्तमान पद्धति के अधीन भारतीयों को एक प्रकार
से बौना बनाया जा रहा है। हमें जीवन - भर सदैव हीनता के वातावरण में जीना होगा।
हममें से सर्वोच्च व्यक्ति को घुटने टेकने ही पड़ेंगे और वर्तमान पद्धति की अपेक्षाओं
को पूरा करना होगा। यह तो अवश्य कहूंगा कि ऊंचा उठने की हमारी सहज भावना
को कुचला जाता है। ईटन तथा हैरो में पढ़ने वाला हर छात्र इसे अनुभव कर सकता
है। वह सोच सकता है कि एक दिन वह ग्लैडस्टन अथवा नैपोलियन अथवा वेलिंग्टन
बन सकता है। उसके लिए वह अपनी योग्यतानुसार भरसक प्रयास कर सकता है।
वर्तमान पद्धति के अधीन हमारा पौरुष उस पूरी बुलंदी को कभी नहीं छू सकता,
जिस तक कि वह पहुंच सकता है। प्रत्येक स्वाशासी व्यक्ति जिस नैतिक उत्थान
को अनुभव कर सकता है, उसे हम अनुभव नहीं कर सकते। हमारी प्रशासनिक तथा
सैनिक प्रतिभाएं धीरे - धीरे समाप्त हो जाएंगी। उनका उपयोग होता ही नहीं और अंत
में हम अपने ही देश में लकड़हारे और कहार बनकर ही रह जाएंगे।
- मैं समिति का ध्यान इस ओर दिलाना चाहता हूं कि ब्रिटिश नौकरशाही की निंदा करने के लिए एक ब्राह्मण ने (निश्चित रूप से एक उदार ब्राह्मण ने) जो ये भावनाएं व्यक्त की हैं, क्या उन्हें और भी मुंहतोड़ तरीके से ब्राह्मण कुल तंत्र की निंदा करने के लिए