1. मताधिकार के बारे में साउथबरो कमेटी के समक्ष दिया गया साक्ष्य - Page 47

30 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय

अस्पृश्य व्यक्त नहीं कर सकते? नौकरशाही की प्रशंसा में कहा जा सकता है कि उसने संगदिल होने के आरोप को झुठला दिया है और अस्पृश्य की भावना के प्रति संवेदना प्रकट की है तथा उस शासन - पद्धति में परिवर्तनों का प्रस्ताव किया है, जिसने उन लोगों के व्यक्तित्व को बौना बना दिया है, जिनके लिए वह तैयार की गई थी। लेकिन क्या ब्राह्मण इससे आधी उदारता का भी दावा कर सकता है? उसका विश्वास है कि हिन्दू समाज - व्यवस्था तो सर्वांगपूर्ण और सनातन है, उसे उसके पूर्वजों ने ऐसा बनाया है। वे तो अतिमानव और त्रिकालदर्शी थे और उन्हें भावी युगों की सनातन - व्यवस्था बनाने की अलौकिक शक्ति प्राप्त थी। जाति श्रेष्ठता की इस कट्टर रूढि़वादिता ने हिन्दू समाज के पुननिर्माण को रोका है और सर्वहित के लिए निहित स्वार्थ वाले अधिकारों के संशोधन में बाधा डाली है। बंबई में मार्च 1918 में अस्पृश्यता को मिटाने के लिए एक सम्मेलन का स्वांग रचा गया था। यद्यपि कार्विर के शंकराचार्य डाक्टर कुर्तकोटि ने सम्मेलन में भाग लेने का वचन दिया था, पर सम्मेलन से ठीक एक - दो दिन पूर्व कुछ अपरिहार्य कार्य से वह उत्तर भारत के लिए रवाना हो गए। श्री तिलक को सम्मेलन में एक संक्षिप्त भाषण देने का गौरव प्राप्त है, लेकिन उनका सौभाग्य है कि उसे समाचार - पत्रों में प्रकाशित ही नहीं किया गया। लेकिन वह अस्पृश्यों की आंखों में धूल झोंकने के लिए दिखावटी सहानुभूति थी, क्योंकि जब अस्पृश्यता निवारण के घोषणापत्र का प्रारूप श्री तिलक के सामने रखा गया, तो विश्वसनीय प्रमाण से पता चला है कि उन्होंने उस पर हस्ताक्षर करने से इंकार कर दिया।

  1. यहां एक राष्ट्र के भीतर प्रत्यक्ष असमरसता को उजागर किया गया है। अतः यह आत्मनिर्णय के सिद्धांत को लागू करने के लिए समुचित क्षेत्र है। यदि उन्नत वर्ग भारत पर उसे लागू करने के लिए शोर मचा रहे हैं और भले ही सत्तारूढ़ शक्तियों ने उसे अंशतः स्वीकार कर लिया है ताकि भविष्य में भारत के लोगों को बौना न बनाया जा सके, तो क्या न्याय की दृष्टि से अस्पृश्य अपने हित में उसके लाभ की मांग नहीं कर सकते? यदि अस्पृश्यों के लिए आत्म - निर्णय की जरूरत को स्वीकार किया जाता है, तो उन्हें संप्रदाय आधारित प्रतिनिधित्व से वंचित नहीं किया जा सकता, क्योंकि संप्रदाय आधारित प्रतिनिधित्व तथा आत्म - निर्णय दो अलग - अलग शब्द हैं, पर उनका भाव एक ही है।
श्री भीमराव अम्बेडकर
का
लिखित अनुपूरक बयान
  1. इस अनुपूरक बयान का प्रमुख उद्देश्य यह दिखाना है कि अपने पिछले बयान में बंबई प्रेसिडेंसी के अस्पृश्यों के लिए प्रतिनिधित्व की जिस योजना की सिफारिश मैंने की हैं, उसे किस प्रकार प्रतिनिधित्व की उस योजना के चौखटे में फिट किया जा सकता है, जिसका प्रस्ताव विधान परिषद के गठन के लिए बंबई सरकार ने किया है।