36 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
वह अस्पृश्यों के लिए मताधिकार में परिवर्तन चाहते हैं, लेकिन यदि दो से अधिक सदस्यों वाले निर्वाचन - क्षेत्रों की स्वीकृति दी जाती है तो मताधिकार के अर्हता - स्तर को कम करने की बात का महत्व गौण हो जाता है। छोटे निर्वाचन - क्षेत्र की दशा में, यथा मराठों की दशा में यह वांछनीय होगा कि उनका समूह बनाया जाए।
यदि किसी निर्वाचन - क्षेत्र में किसी समुदाय विशेष का बहुमत है तो उस समुदाय के लिए अलग से संप्रदाय आधारित प्रतिनिधित्व की जरूरत नहीं है। यदि किसी विशेष निर्वाचन - क्षेत्र में अस्पृश्यों का बहुमत हो तो वे संप्रदाय आधारित प्रतिनिधित्व की मांग नहीं करेंगे। उन्होंने अलग प्रतिनिधित्व की मांग केवल इस कारण की कि वे अल्पसंख्या में हैं और एक समान मताधिकार के आधार पर वे सदैव अल्पसंख्या में ही रहेंगे। मताधिकार के अर्हता - स्तर को नीचा करने के बारे में उनका तर्क यह है कि अस्पृश्य होने के कारण उनके पास संपत्ति है ही नहीं। वे व्यापार नहीं कर सकते, क्योंकि ग्राहक उनके पास आएंगे ही नहीं। उन्होंने एक घटना का हवाला दिया। एक महार औरत तरबूज बेच रही थी। उसे पकड़कर थाने में ले जाया गया। उन्हें बंबई प्रेसिडेंसी से बाहर की स्थिति की जानकारी नहीं है। बंबई प्रेसिडेंसी की मिलों में अब भी अस्पृश्यों को बुनकर विभाग में काम करने की अनुमति नहीं दी जाती। एक अस्पृश्य एक मिल के बुनकर विभाग में अपने को मुसलमान बताकर काम करने लगा, लेकिन पता चल जाने पर उसकी जमकर पिटाई की गई।
चुनाव के सिलसिले में अस्पृश्य की यह परिभाषा संतोषजनक है कि अस्पृश्य वह व्यक्ति है, जो अपने स्पर्श से भ्रष्ट कर दे। ऐसा नहीं है कि कुछ जिलों में कुछ जातियां अस्पृश्य हैं और अन्य जिलों में वे स्पृश्य हों।
उनके वर्गीकरण के अनुसार जनसंख्या का कोई आठ प्रतिशत अंश अस्पृश्य है, लेकिन उन्होंने नौ सीटों का प्रस्ताव किया है। वह कोई नौ प्रतिशत होगा। ये सीटें पृथक संप्रदाय आधारित चुनाव के जरिए भरी जाएंगी।
उन्हें मालूम है कि विकास की वर्तमान स्थिति में अस्पृश्य उत्तरदायी वोट देने के लिए किसी भी प्रकार योग्यता नहीं रखता। समूची बंबई प्रेसिडेंसी में दलित वर्गों के बीच केवल एक बी.ए. है और छह - सात मैट्रीकुलेट हैं। अंग्रेजी जानने वालों का अनुपात नगण्य है, लेकिन पिछड़े वर्गों की तुलना में कम नहीं है। दलित वर्ग, खासकर महार और चमार वोट दे सकते हैं। वह चाहते हैं कि शिक्षा के रूप में उन्हें वोट दिए जाएं। वह उनके बीच कम से कम 25 या उससे अधिक लोगों का पता लगा सकते हैं, जिन्होंने हाई स्कूल की छठी या सातवीं कक्षा पास कर ली है। भले ही यह संख्या अधिक नहीं है, फिर भी दलित वर्गों के लिए उन्होंने जिन नौ सीटों का सुझाव दिया है, उन्हें उनमें से भरा जा सकता है। ऐसा उम्मीदवार व्यावहारिक मामलों में ग्रेजुएट के बराबर होगा, भले ही उत्तरवर्ती स्वयं को बेहतर तरीके से अभिव्यक्त कर सके।
वह ऐसी किसी प्रणाली का विरोध करते हैं, जिसके अधीन अन्य वर्गों से दलित वर्गों के प्रतिनिधि लिए जाएं। यथा, मिशनरियों द्वारा प्रतिनिधित्व सही अर्थ में प्रतिनिधित्व नहीं होगा।