50 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
(ख) यह सुनिश्चित करने का उत्तरदायित्व लेता है कि उसके विलय - पत्र के
अनुसार जहां उपबंध अनुप्रयोजक है, इस अधिनियम के उपबंधों को समुचित
रूप से अपने राज्य में लागू करेगा।
जहां तक देशी राज्य संघ का अंग है, विलय - पत्र के कारण पहले ही सम्राट को प्राधिकार मिल जाता है तथा यह इस कारण से संघ के ऊपर सम्राट का प्राधिकार आंशिक रूप से प्राप्य अधिकार है।
संघ की उत्पत्ति का यही नियम है। इस संघ के विकास का नियम क्या है? दूसरे शब्दों में परिवर्तन का नियम क्या है? परिवर्तन का नियम धारा 6 (2) (क) अनुसूची 2 तथा धारा 6(5) में दिया गया है।
धारा 6(1) (क) में वह स्पष्ट उल्लेख है कि अपने विलय - पत्र के माध्यम से कोई राजा ‘इस अधिनियम द्वारा स्थापित संघ’ में सम्मिलित हो सकता है। अनुसूची 2 में संविधान में भविष्य में होने वाले संशोधन का उल्लेख है। यह घोषणा करती है कि भारत सरकार अधिनियम में क्या - क्या उपबंध है, जिनके संशोधन से विलय - पत्र प्रभावित होगा और वे कौन से उपबंध हैं, जिनके संशोधन से राज्यों का विलय - पत्र प्रभावित नहीं होगा।
धारा 6(5) दो बातें कहती हैं। प्रथमतः इसमें प्रावधान है कि विलय - पत्र इन उपबंधों में संशोधन करने के लिए संसद को अधिकार प्रदान करेगा, जिनकी घोषणा अनुसूची 2 द्वारा की गई है और जो विलय - पत्र को प्रभावित किए बिना संशोधन किए जाने के लिए स्वतंत्र है। दूसरी ओर यह भी प्रावधान है कि यद्यपि संसद इस अधिनियम के उपबंध में विलय - पत्र को प्रभावित किए बिना संशोधन कर सकती है, जैसा कि अनुसूची 2 में घोषणा की गई है कि उनमें ऐसा संशोधन राज्यों पर तब तक बाध्यकारी नहीं होगा, जब तक कि उस राज्य द्वारा पूरक विलय - पत्र के माध्यम से उसे बाध्यकारी स्वीकृत नहीं कर लिया जाता।
संक्षेप में, इस संघ की इकाइयां कार्यवाही की सामान्य व्यवस्था का रूप नहीं लेती। ये इकाइयां अलग - अलग हैं। उन्हें साथ - साथ रखा जाता है। कुछ उद्देश्यों के लिए इन इकाइयों की स्थिति बिल्कुल भी नहीं बदली जा सकती। कुछ अन्य उद्देश्यों के लिए परिवर्तन किया जा सकता है, लेकिन यह परिवर्तन सभी इकाइयों को एक तरह नहीं बांध सकता। कुछ इसे मानने के लिए बाध्य होंगी और कुछ इसे तब तक नहीं मानेंगी, जब तक कि वे बाध्य होने की सहमति प्रदान नहीं कर देती। दूसरे शब्दों में, इस संघ में विकास का कोई प्रावधान नहीं है। यह अचल है। यह गतिशील नहीं हो सकता। विकास द्वारा परिवर्तन संभव नहीं है तथा जहां संभव है, वहां वह तब तक बाध्यकारी नहीं है, जब तक उसे स्वीकृत नहीं किया जाता।