2. संघ बनाम स्वतंत्रता - Page 70

संघ बनाम स्वतंत्रता

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संबंध में विवाद उत्पन्न होता है, धारा 34(3) इस प्रक्रिया से संबंधित है, जब विवाद व्यय की स्वीकृति से संबंधित होता है।

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संघीय कार्यपालिका के गठन का वर्णन धारा 7(1) में किया गया है। इस धारा के अनुसार, संघ के कार्यकारी प्राधिकार गवर्नर - जनरल को सौंपे जाते हैं। गवर्नर - जनरल ही संघ का कार्यकारी प्राधिकारी होता है। इस संघ की कार्यपालिका के बारे में पहली उल्लेखनीय बात यह है कि यह एकात्मक कार्यपालिका होती है और यह निगमित निकाय नहीं है। भारत में जब से अंग्रेजों ने देश का नागरिक व सैनिक शासन हाथ में लिया है, तब से लेकर कार्यपालिका का स्वरूप कभी भी एकात्मक नहीं रहा है। यह कार्यपालिका एक संयुक्त कार्यपालिका थी। प्रांतों में इसे गवर्नर - इन - काउंसिल के नाम से जाना जाता था। केन्द्र में इसे गवर्नर - जनरल - इन - काउंसिल के नाम से जाना जाता था। इन प्रांतों और भारत का नागरिक तथा सैन्य शासन न तो गवर्नर में और न गवर्नर - जनरल में विहित था। जिस निकाय के पास यह अधिकार होता था, वह गवर्नर होता था और उसके साथ पार्षद होते थे। इन पार्षदों की नियुक्ति राजा के द्वारा की जाती थी और उन्हें अपने प्राधिकार गवर्नर - जनरल से प्राप्त नहीं होते थे। वे अपने प्राधिकार सम्राट से प्राप्त करते थे और उनके प्राधिकार गवर्नर तथा गवर्नर - जनरल के समकक्ष होते थे। राज्य - क्षेत्र की शांति तथा सद्भाव के प्रश्नों को छोड़कर गवर्नर - जनरल को बहुमत का निर्णय मान्य होता था। अतः यह संविधान स्थापित प्रणाली से भिन्न है। मैं यह नहीं कह रहा हूं कि यह भिन्नता सिद्धांत के तौर पर ठोस नहीं है, या नजीर या संघीय संविधान की आवश्यकताओं से पैदा होने वाली परिस्थितियों द्वारा इसका औचित्य सिद्ध नहीं होता। मैं आपको जो बात नोट कराना चाहता हूं, वह यह है कि यह बहुत ही महत्वपूर्ण परिवर्तन है।

संघीय कार्यपालिका के बारे में दूसरी उल्लेखनीय बात यह है कि हालांकि संघ का प्राधिकारी गवर्नर - जनरल होता है, तथापि संघीय प्राधिकारी के रूप में अपनी शक्तियों का उपयोग करने के लिए उसके लिए कुछ शर्तें निर्धारित की गई हैं। संविधान उसके प्राधिकार के अ्रंतर्गत आने वाले मामलों को चार श्रेणियों में बांटता है तथा इस बात का उल्लेख करता है कि उसे इन चारों श्रेणियों के अंतर्गत आने वाले प्रत्येक मामले में अपने कार्यकारी प्राधिकार का उपयोग कैसे करना है। कुछ मामलों में गवर्नर - जनरल को (1) अपने विवेक से काम करना है, (2) कुछ मामलों में उसे अपने मंत्रियों की सलाह के अनुसार कार्य करना है, (3) कुछ मामलों में उसे अपने मंत्रियों के साथ परामर्श करने के बाद कार्य करना है, तथा (4) कुछ मामलों में उसे अपने व्यक्तिगत निर्णय के अनुसार कार्य करना है। गवर्नर - जनरल द्वारा कार्यकारी प्राधिकार उपयोग करने के इन चार मामलों को रेखांकित करने वाले विधितः लक्षणार्थ के बारे में भी एकाध शब्द कहे जा सकते हैं। इस विधितः लक्षणार्थ की व्याख्या शुरू करने का सर्वोत्तम तरीका इस बात की व्याख्या करना होगा कि ‘अपने मंत्रियों की सलाह पर कार्य करने’ का क्या तात्पर्य है। इसका तात्पर्य यह है कि ऐसे मामलों में सरकार तो वास्तव में मंत्रियों के प्राधिकार पर चलती है तथा गवर्नर - जनरल का तो केवल नाम ही