54 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
चलता है। दूसरे शब्दों में, मंत्रियों की सलाह, गवर्नर - जनरल पर बाध्यकारी होती है तथा वह उनकी सलाह को ठुकरा नहीं सकता। ऐसे मामलों में जहां गवर्नर - जनरल को स्वाविवेक से कार्य करने का अधिकार प्राप्त है, इसका मतलब है कि सरकार न केवल गवर्नर - जनरल के नाम से चलती है, बल्कि गवर्नर - जनरल के प्राधिकार से चलती है। इसका तात्पर्य है कि मंत्रियों की ओर से किसी भी स्तर पर कोई भी व्यवधान पैदा नहीं किया जा सकता। मंत्रियों को कोई भी सलाह देने का अधिकार नहीं है तथा गवर्नर - जनरल भी उनकी सलाह देने के लिए बाध्य नहीं है। और भी स्पष्ट करने के लिए इन मामलों से संबंधित फाइलों को मंत्रियों के पास भेजने की कोई आवश्यकता नहीं होती। अपने ही निर्णय के अनुसार कार्य करने का तात्पर्य है कि यदि मामला मंत्री के परामर्श क्षेत्राधिकार के अंतर्गत आता है तो उस मंत्री को अंतिम निर्णय लेने का कोई अधिकार नहीं होता। अंतिम निर्णय का अधिकार गवर्नर - जनरल के पास होता है। अपने विवेकानुसार कार्य के अंतर्गत आने वाले मामलों में मंत्रियों को गवर्नर - जनरल को सलाह देने का कोई भी अधिकार नहीं होता, मंत्री अपनी सलाह केवल तभी दे सकता है, जब मामला ‘अपने व्यक्तिगत निर्णय’ के अधिकार के अंतर्गत आता है। दूसरे शब्दों में, अपने व्यक्तिगत निर्णय के अंतर्गत आने वाले मामलों में गवर्नर - जनरल अपने मंत्रियों की सलाह लेने के लिए बाध्य होता है, लेकिन उनकी सलाह को मानने के लिए बाध्य नहीं होगा। वह उनकी सलाह से भिन्न तथा अलग कार्य कर सकता है, लेकिन उसके अपने विवेकाधिकार के अंतर्गत आने वाले मामलों के संबंध में वह अपने मंत्रियों की सलाह तक लेने के लिए बाध्य नहीं है। ‘परामर्श के बाद’ वाक्यांश केवल प्रक्रियागत मामला होता है। ऐसे मामलों में प्राधिकार केवल गवर्नर - जनरल के पास ही होता है। आवश्यकता सिर्फ इस बात की होती है कि वह मंत्रियों की भावनाओं को ध्यान में रखे। इस तरह ‘परामर्श के बाद कार्य करने’ के क्षेत्राधिकार के अंतर्गत आने वाले मामलों को ‘व्यक्तिगत निर्णय’ के अंतर्गत आने वाले मामलों से पृथक किया जा सकता है। ‘व्यक्तिगत निर्णय’ के अधीन आने वाले मामलों में प्राधिकार केवल मंत्रियों के पास होता है। गवर्नर - जनरल केवल निगरानी रख सकता है तथा आवश्यकता पड़ने पर विरोध में निर्णय दे सकता है। ‘परामर्श के बाद’ के अधीन आने वाले मामलों के संबंध में प्राधिकार केवल गवर्नर - जनरल के पास ही होता है तथा मंत्रियों को अपनी भावनाओं को व्यक्त करने की स्वतंत्रता होती है।
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भारत सरकार अधिनियम में संघीय संविधान के एक अंग के रूप में संघीय न्यायालय के गठन का प्रावधान है। इस संघीय न्यायालय में एक मुख्य न्यायाधीश तथा कुछ ऐसे अवर न्यायाधीश हो सकते हैं, जिन्हें महामहिम आवश्यक समझें तथा उनकी संख्या छह से ज्यादा नहीं हो सकती, जब तक कि विधान-मंडल द्वारा इसमें वृद्धि करने संबंधी प्रस्ताव नहीं लाया जाता। संघीय न्यायापालिका के पास मूल तथा अपील संबंधी क्षेत्राधिकार होता है। संघीय न्यायालय के मूल क्षेत्राधिकार का वर्णन करने वाली धारा 204 में व्यवस्था है कि न्यायालय के पास ऐसे मामलों का एकमात्र मूल अधिकार - क्षेत्र होगा जो संघ, प्रांतों