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संघ बनाम स्वतंत्रता

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और विधि - विरुद्ध होगा। ठीक इसी तरह से यदि प्रांतीय विधान-मंडल किसी ऐसे विषय के संबंध में कानून बनाता है, जो संघीय सूची के अंतर्गत आता है तो ऐसा प्रांतीय कानून नियम - विरुद्ध और विधि - विरुद्ध होगा। तथापि, कानून तथा धारा 107 के अनुसार अब इसे कानून का विषय माना गया है। संघीय सूची तथा प्रांतीय सूची के अंतर्गत विधान बनाने से संबंधित विवाद बार - बार पैदा नहीं होते हैं। लेकिन समवर्ती सूची के अंतर्गत नियम बनाने से संबंधित विषयों के बारे में इन दोनों के बीच अन्य विवाद उत्पन्न हो सकता है। इस संबंध में आप धारा 107 में नियम पाएंगे। उप-धारा (1) में व्यवस्था है कि संघ द्वारा बनाया गया कानून कब प्रांत द्वारा बनाए गए कानून से ऊपर होगा। उप-धारा (2) में यह व्यवस्था है कि प्रांत का कानून से किस स्थिति में ऊपर होगा। इन उप-धाराओं को साथ - साथ पढ़ने से कानून की दृष्टि से यह स्थिति है। नियमानुसार संघ का कानून प्रांत के कानून से ऊपर माना जाएगा, यदि इन दोनों के बीच कोई विवाद है। लेकिन ऐसे मामले में जब प्रांत के कानून को गवर्नर - जनरल के विचारार्थ सुरक्षित रख दिया गया है या महामहिम की स्वीकृति के लिए रोक लिया गया है, गवर्नर - जनरल अथवा महामहिम की स्वीकृति प्राप्त होने तक प्रांत का कानून ही सर्वोपरि होगा, जब तक कि संघीय विधान-मंडल उसी मामले के संबंध में कोई दूसरा विधान नहीं बना लेता।

विधान की शक्तियों के इस विभाजन के प्रश्न के संबंध में प्रत्येक संघ के सामने समस्याएं आती हैं। यह समस्या इसलिए उत्पन्न होती है, क्योंकि इस बात की कोई गारंटी नहीं होती कि विधान के विषयों की गणना पूरी तरह से कर ली गई है और उसमें विधान का प्रत्येक संभावित विषय सम्मिलित हैं। सूची कितनी ही पूर्ण तथा विस्तृत क्यों न हो, इस बात की संभावना हमेशा बनी रहती है कि कुछ विषय सूची में शामिल करने से रह जाते हैं। प्रत्येक संघ को ऐसी आकस्मिकता के लिए व्यवस्था करनी होती है और यह निर्धारित करना होता है कि ऐसे बचे हुए विषयों के मामले में कानून बनाने का अधिकार किसके पास होगा। क्या यह शक्तियां केन्द्रीय सरकार को दी जाएं या इकाइयों को दी जाएं? अब तक ऐसे मामलों को निपटाने का केवल एक ही तरीका रहा है। कुछ संघों में ऐसी बची हुई शक्तियां केन्द्र सरकार को दे दी जाती हैं, जैसा कि कनाडा में हैं। कुछ संघों में यह शक्तियां इकाइयों का को दे दी जाती हैं, जैसा कि आस्ट्रेलिया में है। भारतीय संघ ने इनसे निपटने का नया तरीका अपनाया है। भारतीय संघ में इन शक्तियों को न तो केन्द्र सरकार को ही दिया जाता है और न ही प्रांतीय सरकारों को। ये सभी शक्तियां धारा 104 के अनुसार गवर्नर - जनरल के पास होती हैं। जब किसी ऐसे विषय पर जो इन तीनों सूचियों में से किसी भी सूची में नहीं है, कानून बनाने का प्रस्ताव प्रस्तुत किया जाता है, तब गवर्नर - जनरल ही यह निर्णय करता है कि इन शक्तियों का उपयोग संघीय विधान-मंडल द्वारा किया जाए या प्रांतीय विधान-मंडल द्वारा।