2. संघ बनाम स्वतंत्रता - Page 80

संघ बनाम स्वतंत्रता

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आय कर केवल प्रांतों में ही लगाया जा सकता है, राज्यों में नहीं। हालांकि यह कर संघ के उद्देश्यों के लिए होता है। राज्य की प्रजा आय कर पर केवल संघीय अधिभार दे सकती है, क्योंकि इस तरह का अधिभार प्रांतों तथा राज्यों, दोनों में ही लगाए जाने योग्य होता है। लेकिन धारा 138(3) के अंतर्गत संघीय सरकार को राज्य के अंतर्गत इसकी वसूली का अधिकार नहीं है। इसकी वसूली का अधिकार राज्य के शासक के पास होता है। यह शासक अपनी जनता से इस अधिभार को इकट्ठा करने की बजाए संघ को एकमुश्त राशि अदा करने पर सहमत हो सकता है और संघ उसे स्वीकार करने के लिए बाध्य होता है। ठीक ऐसा ही निगम कर के बारे में है। संघ इसे राज्य की जनता पर लगा सकता है, लेकिन वह सीधे तौर पर अपने अभिकरण के माध्यम से इसे इकट्ठा नहीं कर सकता है। धारा 139 में यह व्यवस्था है कि निगम कर की वसूली शासक का कार्य तथा अधिकार होगा।

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भारतीय संघ की तुलना अन्य संघों से कैसे की जा सकती है? यह केवल नैसर्गिक परिप्रश्न नहीं है, बल्कि एक आवश्यक परिप्रश्न भी है। किसी भी चीज को समझने का सबसे बढि़या तरीका उसकी तुलना तथा विपर्यास होता है। यह तुलना दृष्टिकोणों से स्थापित की जा सकती है। इतने बड़े पैमाने पर इसकी तुलना करने का समय नहीं है। मैं इस प्रश्न को बहुत ही सरील आयामों तक सीमित रखता हूं। अतः मैं केवल चार प्रश्न करता हूं : (1) क्या यह संघ एक चिरस्थायी संघ है? (2) संघीय सरकार के साथ इकाइयों का क्या संबंध है? (3) इकाइयों के बीच आपस में कया संबंध है? (4) इकाइयों के अधीन लोगों के क्या संबंध हैं?

इसमें कोई संदेह नहीं है कि संघ में देशी राज्यों का विलय तब तक चिरस्थायी है, जब तक कि इस अधिनियम के द्वारा बनाया गया संघ अस्तित्व में है। और जब तक संघ अस्तित्व में है, तब तक उससे अलग होने का कोई अधिकार नहीं। लेकिन यह कोई असल प्रश्न नहीं है। असल प्रश्न यह है कि क्या इस अधिनियम के बदले जाने पर भी संघ होगा? दूसरे शब्दों में, क्या यह संघ चिरस्थायी है जिससे अलग होने का कोई अधिकार नहीं है, या यह केवल गठबंधन है जिससे अलग होने का अधिकार है? मेरे विचार में भारतीय संघ चिरस्थायी संघ नहीं है और देशी राज्यों को उससे अलग होने का अधिकार है। इस संबंध में संयुक्त राज्य तथा इस भारतीय संघ का संविधान एक - दूसरे के विपरीत है। संयुक्त राज्य का संविधान अलग होने के अधिकार पर कुछ नहीं कहता। इस भूल की व्याख्या दो अलग - अलग तरीकों से की गई है। कुछ ने कहा है कि इसकी व्यवस्था इसलिए नहीं की गई, क्योंकि इसे मान्यता नहीं दी गई थी। दूसरों ने कहा कि इसको इसलिए असम्मिलित किया गया, क्योंकि इसे नकारा नहीं गया था। इस प्रश्न पर यह विवाद था कि क्या अलग होने के अधिकार को इसलिए असम्मिलित किया गया, क्योंकि