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संघ बनाम स्वतंत्रता

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इस परिप्रेक्ष्य यह तथ्य उल्लेखनीय है कि यह अधिनियम ब्रिटिश भारत तथा देशी राज्यों के लिए संघीय सरकार की स्थापना नहीं करता। यह अधिनियम केवल ब्रिटिश भारत के लिए ही संघीय सरकार की स्थापना करता है। यह संघीय सरकार राज्यों के लिए सरकार केवल तभी बनेगी, जब राज्य अपने विलय - पत्र के माध्यम से इसे अंगीकार कर लें। पुनः ध्यान दें कि संघीय सरकार के अधीन राज्यों का होना हमेशा के लिए जरूरी नहीं है। यह केवल कुछ विशेष परिस्थितियों के अंतर्गत ही लागू रहेगा। यह केवल तब तक चलता रहेगा, जब तक कि इस अधिनियम के कुछ प्रावधानों में कोई परिवर्तन नहीं किया जाता। तीसरे, जहां इन उपबंधों में कोई परिवर्तन अनुज्ञेय है तो ऐसा परिवर्तन राज्यों पर बाध्यकारी नहीं होगा, जब तक कि राज्य इससे बाध्य होने के लिए सहमत नहीं हो जाते।

ये सभी निर्विवाद लक्षण संकेत हैं जो यह दर्शाते हैं कि भारतीय संघ एक गठबंधन है, न कि चिरस्थायी संघ। किसी गठबंधन का सार यह होता है कि इसके पास अलग होने का अधिकार सुरक्षित रहता है और वह अपनी मूल स्थिति में वापस जा सकता है।

अतः इस दृष्टिकोण से भारतीय संघ, संयुक्त राज्य अमेरीका, कनाडा तथा आस्ट्रेलिया के संघ से भिन्न है। यह संयुक्त राज्य अमरीका से इस मायने में भिन्न है कि इसमें भारतीय संविधान द्वारा अलग होने के अधिकार को मान्यता प्रदान की गई है, यदि यह संविधान बदल जाता है, जब कि संयुक्त राज्य अमरीका के संविधान द्वारा इसको मान्यता नहीं दी गई है, भले ही संविधान किसी विशेष राज्य की इच्छाओं के विपरीत बदल दिया गया हो। आस्ट्रेलिया तथा कनाडा के संबंध में ऐसा प्रश्न नहीं उठता और अगर ऐसा प्रश्न उठा तो गृह-युद्ध भी इस मुद्दे को हल नहीं कर सकेगा। इन संघों में प्रभुसत्ता, भले ही इसका संघीय सरकार या इकाइयों द्वारा प्रयोग किया जाता है, सम्राट के पास होती है और इसका रख - रखाव या इसको तोड़े जाने का अधिकार सम्राट तथा संसद का होता है। न तो संघ ही और न इकाइयां इस मुद्दे को हल कर सकती हैं, यह केवल संसद की सहमति से किया जा सकता है। यदि विघटन होता है तो यह मात्र सम्राट की प्रभुसत्ता का त्याग होगा और इसका पुनः विभाजन करने के लिए सम्राट हमेशा ही स्वतंत्र होता है। यह विघटन वैधानिक होगा और यदि इसे गैर - कानूनी साधनों द्वारा बनाए रखा गया तो इससे प्रभुसत्ता विद्रोही इकाइयों के पास चली जाएगी, क्योंकि यह सम्राट के पास होती है। इसमें ठीक वैसा ही होता, यदि भारतीय संघ ब्रिटिश भारत के प्रांतों का ही संघ होता। तब अलग होने का तो कोई प्रश्न नहीं उठता। प्रांत उसी हालत में रह रहे होते, जैसा कि सम्राट उन्हें रखना चाहता। भारतीय संघ देशी राज्यों की प्रविष्टि के कारण भिन्न होता है। देशी राज्यों का यह प्रवेश हमेशा के लिए नहीं है और न ही परिस्थिति के अंतर्गत है। उनका प्रवेश कुछ शर्तों तथा निबंधनों पर निर्भर करता है। ऐसा होने के कारण भारतीय संघ चिरस्थायी संघ नहीं हो सकता। वास्तव में, देशी राज्य प्रांतों के साथ तब तक स्थापित नहीं करेंगे, जब तक कि ऐसा करने से पूर्व पृथक होने की शर्तों को तय नहीं कर लिया जाता है। यही कारण है कि भारतीय संघ एक गठबंधन है, संघ नहीं।