66 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
| bd | k | b; |
|---|
| d | k |
|---|
संघीय सरकार के साथ इकाइयों का संबंध
संघ की सामान्य विशेषता यह है कि प्रत्येक अलग इकाई के पास लगभग समान राजनीतिक अधिकार होने चाहिएं। भिन्न इकाइयों के बीच समानता आवश्यक है। दर्जे के मामले में उन्हें असमान बनाने का मतलब है, इकाइयों को प्रभावी भागीदार बनाए जाने की शक्ति देना। जैसा कि डायसी ने कहा है कि किसी संघ में प्रभावी भागीदारी के होने से दो तरह के खतरे सामने आते हैं। पहला, प्रभावी भागीदार संघीय समानता के विपरीत प्राधिकार का उपयोग कर सकता है। दूसरे, यह संघ के अंदर प्रभावी इकाइयों तथा अधीनस्थ इकाइयों के या इसके विपरीत समूह बना सकता है। इस तरह की गलत कार्य - परंपरा को रोकने के लिए सभी संघ की समानता के सिद्धांत पर सहमत हो जाते हैं। भारतीय संघ में इस सिद्धांत को किस सीमा तक प्राप्त किया जाता है? कानून बनाने के संबंध में
जैसा कि आप जानते हैं कि कानून बनाने के उद्देश्य से इस क्षेत्र को तीन भागों में बांटा गया है और तीन सूचियां तैयार की गई हैं, जिन्हें संघीय सूची, समवर्ती सूची तथा प्रांतीय सूची कहा जाता है।
संघीय सूची में 59 मदें शामिल हैं, जिनके संबंध में संघ कानून बना सकता है। समवर्ती सूची में 36 मदें शामिल हैं।
पहली बात यह है कि ये दोनों ही सूचियां प्रांतों पर लागू होती हैं। वे अपनी मर्जी से इन दोनों सूचियों में से विषयों को नहीं चुन सकते हैं, जिनके संबंध में वे संघ के प्राधिकार के अधीन होंगे। प्रांतों को इन दोनों सूचियों में से बाहर जाने की स्वतंत्रता नहीं है। संघ में शामिल होने वाले राज्य की स्थिति बिल्कुल भिन्न है। संघ में शामिल होने वाला राज्य स्वयं को समवर्ती सूची से बिल्कुल बाहर रख सकता है। धारा 6(2) के अनुसार किसी भी देशी राज्य के शासक को समवर्ती सूची में सम्मिलित मामलों के संबंध में संघ में शामिल होने के लिए सहमत होने में कोई आपत्ति नहीं है। लेकिन उनके ऊपर ऐसा करने के लिए कोई बाध्यता नहीं है। इस तरह का करार उनके संघ में प्रवेश के लिए कोई पूर्व शर्त नहीं है।
संघीय सूची के संबंध में कोई संदेह नहीं है कि राज्य के शासक को संघ की सूची के संबंध में स्वयं को संघ के कानून बनाने के प्राधिकार के अधीन मानना होगा, लेकिन संघ के अधीन होना केवल उन्हीं मामलों तक सीमित होगा, जिनका कि उल्लेख उसने अपने विलय - पत्र में किया है। जैसा कि मैने कहा है, संघीय सूची में 59 मदें होती हैं। कोई भी शासक इस बात के लिए बाध्य नहीं है कि संघ में सम्मिलित होने से पूर्व वह संघीय सूची में सम्मिलित सभी विषयों को स्वीकार करे। वह केवल कुछ को स्वीकार कर सकता है, या सभी को स्वीकार कर सकता है। इसी प्रकार एक शासक एक मद को स्वीकार कर सकता है तथा दूसरा शासक दूसरी मद को स्वीकार कर सकता है। संविधान में ऐसा कोई नियम निर्धारित नहीं है कि संघ में शामिल होने से पहले प्रत्येक शासक को