संघ बनाम स्वतंत्रता
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कुछ मदें स्वीकार करनी चाहिएं। अतः संघ जहां एक ओर ब्रिटिश भारत तथा प्रांतों को संघ के कानून बनाने के प्राधिकार के मामले में समान रूप से तथा पूरी तरह से प्रभावित करता है, वहीं यह विभिन्न राज्यों को भिन्न - भिन्न तरीके से प्रभावित करता है। कोई एक शासक केवल एक विषय के मामले में संघ शामिल हो सकता है, लेकिन फिर भी वह संघ का उतना ही वास्तविक सदस्य होगा, जितना कि वह शासक जो संघीय सूची की सभी 59 मदों को स्वीकार करता है।
प्रांतीय सूची वह सूची है, जिसके बारे में प्रांतों को ही कानून बनाने का पूरा - पूरा अधिकार होगा। इस अधिनियम में संघीकृत राज्यों के लिए कोई समान राज्य सूची नहीं दी गई है। यह दी भी नहीं जा सकती। लेकिन यह कहा जा सकता है कि इसमें वे सभी विषय सम्मिलित होते हैं, जो राज्य द्वारा संघ को नहीं सौंपे जाते। अब प्रांतीय विधान-मंडल के अनन्य प्राधिकार के संबंध में आपातकाल की स्थिति में भी संघीय विधान-मंडल किसी प्रांत के लिए कानून बना सकता है या प्रांतीय सूची में उल्लिखित मामलों से संबंधित किसी भी भाग के संबंध में कानून बना सकता है, यदि गवर्नर - जनरल ने अपने विवेक से धारा 102 के अंतर्गत यह घोषणा कर दी है कि गंभीर आपातकाल की स्थिति पैदा हो गई है और भारत की सुरक्षा खतरे में हैं, भले ही ऐसा युद्ध के कारण हो या आंतरिक गड़बड़ी के कारण। देशी राज्यों के संबंध में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है। भारत के लिए खतरा उत्पन्न करने वाली गंभीर आपातकालीन स्थिति किसी राज्य के अंदर पैदा हो सकती है, जैसी कि वह किसी प्रांत के सीमा - क्षेत्र के भीतर पैदा हो सकती है। अतः यह स्पष्ट है कि आपातकाल की स्थिति में जहां संघीय विधान-मंडल किसी प्रांत के लिए कानून बना सकता है और हस्तक्षेप कर सकता है, वहीं सामान्य परिस्थितियों के अंतर्गत संघीकृत राज्यों के मामले में न तो हस्तक्षेप कर सकता है और न ही उनके लिए कानून बना सकता है।
संघ की कार्यपालिका के संबंध में
कार्यपालिका के संबंध में राज्य तथा प्रांत समान अधिकार नहीं रखते। धारा 8 संघ के कार्यकारी प्राधिकार के क्षेत्र को परिभाषित करती है, जो धारा 7 के अनुसार महामहिम की ओर से गवर्नर - जनरल द्वारा उपयोग में लाई जा सकती है। उपखंड (क) की उप-धारा (1) के अनुसार संघीय कार्यपालिका का प्राधिकार उन मामलों तक लागू होता है, जिनके बारे में संघीय विधान-मंडल को कानून बनाने का अधिकार प्राप्त है, लेकिन यह खंड राज्यों के मामलों में ठीक उसी तरह लागू नहीं होता, जिस तरह प्रांतों के मामलों में होता है। प्रांतों के मामलों में इसे उन सभी मामलों के बारे में प्राधिकार प्राप्त होता है, जो संघीय विधायी सूची में सम्मिलित हैं। कुछ सीमाओं के तहत समवर्ती सूची के विषयों के मामले में भी इसके पास पूरा - पूरा प्राधिकार होता है; लेकिन राज्यों के संबंध में बिल्कुल पृथक मामला है। राज्यों के संबंध में समवर्ती सूची में दिए गए विषयों के बारे में संघ के पास कोई कार्यकारी प्राधिकार नहीं होता। साथ ही संघीय विधायी सूची में सम्मिलित मामलों के बारे में संघ पूरे प्राधिकार का हकदार नहीं है। धारा 8 का उपखंड 2 बहुत ही महत्वपूर्ण है। इसके अनुसार :