संघ बनाम स्वतंत्रता
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अथवा भ्रष्ट होता है, वहां कानून का कोई लाभ नहीं है। संघीय सरकार की प्रशासनिक शक्तियों को छीनना, संघीय सरकार को पंगु बनाने के बराबर है। ऐसा कोई संघ नहीं है, जहां संघ की कुछ इकाइयों को यह कहने की छूट हो कि उसके क्षेत्र में संघीय सरकार को प्रशासनिक शक्तियां प्राप्त नहीं हैं। भारतीय संघ एक अपवाद है। न सिर्फ प्रांत और देशी राज्यों में इस मामले में एक अंतर है, वरन वे संघीय सरकार द्वारा कार्यकारी प्राधिकार के प्रयोग के पर्यवेक्षण और निर्देश के अपने उत्तरदायित्व के मामले में भी भिन्न हैं। अगर आप धारा 126 की तुलना 128 के साथ करें तो यह अंतर स्पष्ट हो जाएगा।
धारा 126 यह अधिनियम करती है कि हर प्रांत के कार्यकारी प्राधिकार का उपयोग इस प्रकार किया जाएगा, जिससे कि संघ के कार्यकारी प्राधिकार के प्रयोग में बाधा न आए या उसके प्रयोग पर प्रतिकूल प्रभाव न पड़े और संघ का कार्यकारी प्राधिकार एक प्रांत को ऐसे निर्देश दे सकेगा, जैसा कि उस उद्देश्य के लिए संघीय सरकार आवश्यक समझाता है। धारा 128 एक ऐसी धारा है जो संघीकृत राज्य के विषय में इसी प्रकार का नियम बनाती है, लेकिन इन दोनों धाराओं के बीच एक महत्वपूर्ण अंतर है। धारा 126 कहती है कि संघ का कार्यकारी प्राधिकार एक प्रांत को इस प्रकार के निर्देश दे सकता है, जैसा कि संघीय सरकार को उस उद्देश्य के लिए आवश्यक लगता है, जबकि धारा 128 ऐसी कोई शक्ति प्रदान नहीं करती। इसका अर्थ यह है कि संघ के पास अंतर्निहित कार्यकारी प्राधिकार नहीं है जो संघीकृत राज्य के शासक को राज्य का ऐसा कार्यकारी प्राधिकार प्रयुक्त करने से रोक सके, जो संघ के कार्यकारी प्राधिकार को बाधित करता है, अथवा प्रतिकूल असर डालता है। यह एक बहुत ही महत्वपूर्ण अंतर है। ऐसा प्राधिकार संघ की बजाए गवर्नर - जनरल को प्रदान किया गया है, जो वास्तव में विधि के अनुसार संघीय सरकार से भिन्न है और गवर्नर - जनरल शासक को ऐसे निर्देश देने के लिए सक्षम है, जिन्हें वह उचित समझता है। एक और अंतर भी दृष्टव्य है। धारा 126 के अंतर्गत जब एक प्रांत के गवर्नर को निर्देश दिए जाते हैं तो वह उन्हें मानने के लिए बाध्य है। वह निर्देशों की आवश्यकता के विषय में पूछ सकता है। एक राज्य के शासक के विषय में स्थिति बिल्कुल भिन्न है। वह ऐसे निर्देश के बारे में सवाल कर सकता है और मामले को संघीय न्यायालय में मध्यस्थता हेतु ले जा सकता है, क्योंकि धारा 128 की उप-धारा में विहित प्रावधान के अनुसार अगर इस धारा के अंतर्गत कार्यकारी प्राधिकार एक राज्य में प्रयोक्तव्य है, ऐसे किसी भी विषय में अथवा उस सीमा तक कि जिसमें इस प्रकार वह प्रयोक्तव्य है, यह प्रश्न संघ अथवा शासक के अनुरोध पर संघीय न्यायालय के समक्ष उस न्यायालय द्वारा निबटारे हेतु ले जाया जाएगा।
वित्त के संबंध में
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अब वित्त के सवाल पर आते हैं। प्रांतों और राज्यों के मध्य एक सुस्पष्ट असमानता है। संघ का प्रांतों और राज्य के ऊपर कराधान प्राधिकार का मामला ले लीजिए। यह ध्यान रहे कि संघ के राजस्व जिन स्रोतों से प्राप्त होते हैं, वे दो प्रमुख शीर्षों के अंतर्गत आते हैं - एक वे जो कराधान के अंतर्गत आते हैं और दूसरे वे जो कराधान के अंतर्गत