2. संघ बनाम स्वतंत्रता - Page 91

74 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय

भारतीय संविधान में संघ के अंतर्गत वाणिज्य और व्यापार संबंधी प्रावधान धारा 297 में विहित है। यह इस प्रकार है :

(1) किसी भी प्रांतीय विधान-मंडल या सरकार को -

(क) प्रांतीय विधान-मंडलीय सूची में प्रांत के अंतर्गत वाणिज्य और व्यापार विषयक

प्रविष्टि की महत्ता से अथवा उस सूची में माल के उत्पादन, प्रदाय और वितरण

से संबंधित प्रविष्टि के कारण कोई कानून पारित करने अथवा कोई कार्यकारी

कदम उठाने अथवा प्रांत के किसी भी श्रेणी या किस्म के माल को अंदर प्रवेश

या निर्यात करने से निषिद्ध और प्रतिबंधित करने की शक्ति प्राप्त नहीं होगी,

अथवा

(ख) इस अधिनियम में किसी भी कारण से किसी प्रकार के कर, उपकर, चुंगी लगाने

अथवा बकाया वसूलने की शक्ति प्राप्त होगी, अगर उसके कारण प्रांत में निर्मित

अथवा उत्पादित वस्तुओं और प्रांत में निर्मित अथवा उत्पादित न होने वाली

उसी प्रकार की वस्तुओं के बीच पहले के पक्ष में भेदभाव उत्पन्न होता हो, और

जिससे प्रांत से बाहर निर्मित अथवा उत्पादित वस्तुओं के मामले में, एक स्थान

में निर्मित अथवा उत्पादित वस्तुओं तथा दूसरे स्थान में निर्मित अथवा उत्पादित

उसी प्रकार की वस्तुओं के बीच भेदभाव उत्पन्न हो।

(2) कोई भी कानून जो इसके उल्लंघन में पारित किया गया हो, उल्लंघन की सीमा

तक अमान्य होगा।

अब इस धारा की शर्तों के अनुसार यह स्पष्ट हो जाता है कि व्यापार और वाणिज्य की स्वतंत्रता प्रांतों तक ही सीमित है। इसका अर्थ है कि देशी राज्य प्रांतों से आने वाले माल के प्रवेश को पूर्णतया रोकने में स्वतंत्र हैं अथवा उन पर सीमा शुल्क लगा सकते हैं। यह एक संघीय शासन की मूल भावना के विपरीत है। संघ की एक इकाई को दूसरी इकाई के विरुद्ध व्यापारिक युद्ध की इजाजत देना संघ को नकारने के अतिरिक्त और कुछ नहीं हैं।

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इस प्रश्न पर विचार करने से पूर्व यह आवश्यक है कि कतिपय विशिष्टताओं को स्पष्ट कर दिया जाए। ‘राज्य’ और ‘समाज’ बहुधा ऐसे प्रस्तुत किए जाते हैं, जैसे कि दोनों में विरोधाभास हो। लेकिन राज्य और समाज के मूल स्वरूप में कोई विभेद नहीं है। यह सही है कि राज्य की पूर्ण शक्तियां विधि द्वारा संचालित होती हैं, जबकि समाज अपनी पूर्ण शक्तियों के प्रवर्तन हेतु धार्मिक और सामाजिक मान्यताओं पर आधारित होता है। लेकिन तथ्य यही है कि दोनों को बल प्रयोग की पूर्ण शक्तियां प्राप्त हैं। अतएव, राज्य और समाज में कोई विरोध नहीं है। दूसरे, जिन व्यक्तियों से समाज बनता है, वही व्यक्ति राज्य के भी सदस्य होते हैं। इस दृष्टि से भी राज्य और समाज में कोई अंतर नहीं है।

यद्यपि दोनों में एक अंतर है, लेकिन वह दूसरी किस्म का है। हर व्यक्ति जो समाज का सदस्य है और इसमें अधिवास करता है, यह आवश्यक नहीं है कि वह राज्य का