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संघ बनाम स्वतंत्रता

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उनका कुछ भारतीय प्रांतों में विलीनीकरण हो जाएगा? मैं इन सबका इसलिए उल्लेख कर रहा हूं कि प्रथमतः मैं यह बताना चाहूंता कि यह संघ एक अखिल भारतीय संघ नहीं है, और दूसरे, मैं कुछ देशी राज्यों के इन कदमों की ओर ध्यान आकर्षित करना चाहता हूं कि वे इन बहिष्कृत राज्यों का अपने अंतर्गत विलय चाहते हैं।

एक दूसरा सवाल भी उठाया जा सकता है। क्या यह संघ ब्रिटिश भारत और देशी राज्यों की जनता को एक राष्ट्र में संगठित करने में मदद करेगा?

एक संघ आवश्यक तौर पर एक संगठित समुदाय होता है। इसके अंतर्गत जो इकाइयां होती हैं वे छोटे राजनीतिक समुदाय होते हैं। इकाइयों के ऊपर बहुत बड़ा राजनीतिक समुदाय होता है, जिसे संघ कहते हैं। क्या ये विभिन्न राजनीतिक समुदाय मात्र राजनीतिक संगठन बने रहेंगे अथवा एक सामान्य सामाजिक ढांचे में विकसित होंगे, जिसका अंतिम उद्देश्य एक राष्ट्र का निर्माण करना है? यह सब इस बात पर आधारित रहेगा कि इनके संगठनों का क्या प्रारूप बनता है।

ब्राइस के कथानुसार :

एक बड़े राजनीतिक समुदाय के अंतर्गत जब छोटे समुदाय का अस्तित्व मिलता है तो

छोटे का बड़े के साथ आमतौर पर जो एक दो तरह का संबंध दिखाई देता है, वह

दो प्रकार का होता है। एक रूप है लीग का जिसमें कई राजनीतिक संगठन, चाहे वे

राजतंत्र हो या लोकतंत्र, किसी विशेष उद्देश्य से इस प्रकार गठित होते हैं, विशेषतया

सामान्य सुरक्षा के विषय में, जिससे एक संगठित संस्था का आभास हो। ऐसे संगठित

समुदाय या लीग के सदस्य मनुष्य नहीं, वरन् समुदाय होते हैं। यह समुदायों के कुल

योग से बनती है। इसलिए समुदाय, जिनसे इसका निर्माण होता है, जब एक - दूसरे

से अलग होते हैं तो इसका शीघ्र ही अंत हो जाता है। साथ ही इसका संबंध समुदाय

से ही होता है और उन्हीं के साथ कार्य - व्यापार चलता है। नागरिक से इसका कोई

संबंध नहीं होता, न उससे कर उगाही की जाती है, न उसके लिए न्याय व्यवस्था

की जाती है, न ही उसके लिए विधि का निर्माण किया जाता है, क्योंकि इन सभी

मामलों में उसकी निष्ठा अपने निजी समुदाय से ही होती है।

दूसरे प्रारूप में, छोटे समुदाय बड़े की मात्र उप - शाखाएं होती हैं, जिन्हें राष्ट्र कहते

हैं। उनका निर्माण किया गया है, अथवा वे येनकेन प्रकारेण सिर्फ प्रशासनिक दृष्टि

से अस्तित्व में हैं। उनके पास जो शक्तियां हैं, वे राष्ट्र द्वारा सौंपी गई हैं और जिन्हें

इसकी इच्छानुसार रद्द किया जा सकता है। एक राष्ट्र अपने अधिकारियों के जरिए

सीधे काम करता है, मात्र समुदायों पर ही नहीं, वरन् हर एकल नागरिक और राष्ट्र

पर, क्योंकि यह इन समुदायों से स्वतंत्र है, इसका अस्तित्व बना रहेगा, वे सब मिट

जाएंगे। ....

प्रथम मामले में सरकार का स्वरूप महासंघ का है। दूसरे मामले में सरकार का स्वरूप एकात्मक है। एक संघीय सरकार इन दोनों के मध्य में है। तथापि यह धारणा नहीं बनानी चाहिए कि राष्ट्रवाद सिर्फ एकात्मक सरकार में ही सुसंगत है और संघीय सरकार