130 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
अवस्था में गैसों की नलियों में बनती है तथा उसका सल्फयूरिक एसिड में कारगर परिवर्तन मुश्किल है। सल्फर तथा सल्फयूरिक एसिड के उत्पादन के लिए आपूर्ति के इस स्रोत की संभावना की युद्ध के दौरान शुरू में ही जांच की गई थी परन्तु इसे कार्यान्वित नहीं किया गया क्योंकि इसके लिए जटिल और मंहगी मशीनरी का आयात करना पड़ता और तकनीकी व्यक्तियों का प्रबंध भी करना पड़ता तथा इसके बावजूद भी सफलता प्राप्त करने के लिए बहुत सी समस्याओं का सामना करना पड़ता।
(घ) जी नहीं। 4 अगस्त, 1943 के अतारांकित प्रश्न सं. 47 के उत्तर में माननीय आपूर्ति सदस्य ने अमेरिका से संयंत्रों के प्रस्तावित आयात के संबंध में पूरी सूचना दे दी है।
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* उदयपुर राज्य में जवार में सीसे की खान
291. श्री टी.अी. कृष्णामाचारी (श्री आर.आर. गुप्ता की ओर से)ः (क) क्या माननीय श्रम-सदस्य यह बताने की कृपा करेंगे कि क्या यह सच है कि उदयपुर राज्य में जवार में चल रही सीसे की खान भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण की उपयोगिता शाखा द्वारा चलाई जा रही है_ यदि हाँ तो इस खान में चल रहे कार्य पर अब तक कितना धन खर्च किया जा चुका है तथा इस खान में से निकाले गए अयस्क में सीसे तथा जस्ते का औसत प्रतिशत क्या है_ और
(ख) क्या सरकार को भारत के किसी अन्य भाग में सीसे के पाए जाने की कोई सूचना है और यदि नहीं, तो भारत को सीसे की आवश्यकताओं का कितना अंश केवल जवार स्रोत से प्राप्त होने की आशा है?
माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः (क) जी हाँ। जून, 1943 तक साढ़े छः लाख रुपए की धनराशि इस पर खर्च की जा चुकी है। अब तक किए गए खनन में औसतन 2 प्रतिशत सीसा तक 8 प्रतिशत जस्ता प्राप्त किया जा चुका है।
(ख) जी हाँ। इस समय इसके जयपुर राज्य के चौथ का बरवारा में पाए जाने की संभावना सबसे अधिक है।
* विधानसभा वाद-विवाद (केन्द्रीय), 1943 का खण्ड 3, 12 अगस्त, 1943, पृष्ठ 655