270 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
(घ) मैं माननीय सदस्य का ध्यान श्री नियोगी के तारांकित प्रश्न संख्या 17 के भाग (क), (ख), (ग), (घ), और (च) के बारे में माननीय आपूर्ति सदस्य द्वारा विधान सभा में दिए गए उत्तरों की ओर आर्किषत करता हूँ। उनमें श्रमिकों की कमी और कोयले की कमी से उत्पन्न स्थिति से निपटने के लिए सरकार द्वारा उठाए गए विभिन्न कदमों का उल्लेख किया गया है।
उद्योग के प्रतिनिधि भी दिसम्बर, 1943 में धनबाद में खदान मजदूरों की नकद मजदूरी बढ़ाने और भोजन की आपूर्ति पर रियायत देने के लिए राजी हो गए थे।
श्री मनु सूबेदारः मजदूरी में कितनी वृद्धि हुई है जिसे युद्ध पूर्व दरों की तुलना में देने के लिए नियोजक बाध्य हैं?
माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः मुझे अफसोस है कि मैं आंकड़े नहीं दे सकता। लेकिन यहां मेरे पास एक विवरण है जो अच्छा भरा हुआ है और मुझे पक्का विश्वास है कि माननीय सदस्य को उसमें यह सब मिल जाएगा जो वह चाहते हैं।
श्री मनु सूबेदारः सरकार ने यह देखने के लिए क्या कदम उठाए हैं कि इस कष्टकारी ढंग से खानों में काम करने वाली स्त्रियां कम से कम उन औरतों से कुछ थोड़ा-ज्यादा पाएं जो अन्य व्यापारों में भूमि पर काम करती हैं?
माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः मैं अपने माननीय मित्र को आश्वस्त करता हूँ कि कोयला खानों में मजदूरी 50 प्रतिशत से भी अधिक बढ़ा दी गई है।
श्री मनु सूबेदारः सरकार ने कोयला खान मालिकों को बाध्य करने के लिए क्या उपाय किए हैं_ सरकार युद्ध से पूर्व 3-8-0 रुपए के बजाय अब 9-8-0 रुपए कोयले के लिए देती है। यदि कोयले के लिए आप इतना अधिक देते हैं तो क्या आपने कोई शर्त रखी है कि यह अतिरिक्त भाग स्त्री कामगारों को मिलेगा जिन्हें आपने अपमानजरक ढंग से खानों में धकेल दिया है।
माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः मेरे विचार में हम सभी आवश्यक कदम उठा चुके हैं।
श्री एन.एम. जोशीः क्या यह बात सही नहीं है कि भारत सरकार सैनिक ठेकेदारों द्वारा खनिजों को नियोजित किए जाने से इसलिए रोकने के लिए उपाय कर रही है कि खनिकों को विवश होकर काम के लिए खानों में जाना पड़े जहां वे भूखे मरने की जोखिम उठाएं?