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354 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय

कानूनी प्रावधानों के अतिरिक्त बहुत से उद्यम अपने कर्मचारियों को भिन्न-भिन्न मात्रा में वेतन सहित छुट्टियां देते हैं।

जहां तक इलाज का संबंध है, कारखानों और खानों के भीतर कानूनी प्रावधान केवल प्राथमिक उपचार की बाबत है। कुछ उद्यम डिस्पैंसरियां और अस्पताल चलाते हैं, किन्तु इनके अलावा, कर्मचारियों को प्रांतीय सरकारों द्वारा दी जाने वाली चिकित्सा सुविधिओं पर निर्भर रहना पड़ता है।

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* खानों में महिला मजदूर

938. श्री अमरेन्द्र नाथ चट्टोपाध्यायः (क) क्या माननीय श्रम सदस्य यह बताने की कृपा करेंगे कि खानों में महिला मजदूरों की संख्या कितनी है और क्या खानों में बाल मजदूर अर्थात् अवयस्क हैं_ यदि हां, तो किस-किस आयु के_

(ख) कारखानों, मिलों और खानों में स्त्रियों को क्या-क्या प्रसूति सुविधाएं दी जाती हैं। माननीय सदस्य खानों में महिला मजदूरों को कब तक काम पर लगाए रखने की सोचते हें_

(ग) कारखानों, मिलों और खानों में श्रम कल्याण अधिकारियों का क्या काम है_ उनकी योग्यताएं क्या हैं?

माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः (क) 1943 में खानों में महिला मजदूरों की संख्या 72,403 थी (इसमें वे भी शामिल हैं जो भूतल पर और भूमिगत काम करती है), 1944 के आंकड़े उपलब्ध नहीं है। इंडियन माईन्स एक्ट (भारतीय खान अधिनियम) के अनुसार खानों में कोई भी बालक नियोजित नहीं है।

(ख) इस समय लागू (या विचाराधीन) प्रसूति सुविधा संबंधी विधान के कुछ महत्त्वपूर्ण प्रावधानों को दर्शाने वाला एक तुलनात्म्क विवरण सदन के पटल पर रखा जाता है। बम्बई और मद्रास से हाल में प्राप्त जानकारी से संकेत मिलते हैं कि उन प्रांतों में कुछ मिलों ने प्रसूति सुविधा प्रतिदिन आठ आने की कानूनी दर से बढ़ाकर 12 आने की दी है।

सवाल के दूसरे भाग के बारे में, स्त्रियों को खानों में काम से पूरी तरह हटाने का कोई इरादा नहीं है।

* विधानसभा वाद-विवाद (केन्द्रीय), खण्ड 2, 1945, 13 मार्च, 1945, पृष्ठ 1408-09