80 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
निवास करती हैं। वह वही है, जो मन से महान है और जो सामर्थ्य में भी
महान है। वही बनाने वाला है और वहीं मिटाने वाला है। पिता की भाँति उसने
हमें बनाया और यमराज की तरह वह हम सब के भाग्य से परिचित है। 20. बुद्ध ने सभी वैदिक ऋषियों को आदर के योग्य नहीं समझा। उन्होंने केवल
दस ऋषियों को सबसे प्राचीन और मंत्रों का मूल रचयिता माना। 21. लेकिन उन मंत्रों में उन्होंने ऐसा कुछ नहीं देखा, जिससे मानव के नैतिक उत्थान
में सहायता मिलती हो।
बुद्ध की दृष्टि में वेद मरुभूमि के समान निष्प्रयोजन थे।
इसलिए बुद्ध ने मंत्रों को इस योग्य नहीं समझा कि इससे कुछ सीखा जा सकता
है या ग्रहण किया जा सकता है।
- इसी प्रकार बुद्ध को वैदिक ऋषियों के दर्शन में भी कुछ सार नहीं दिखाई देता
था। निस्संदेह वे (ऋषि) सत्य को अंधेरे में टटोल रहे थे, लेकिन उन्होंने उसे
पाया तक नहीं था।
- उनके सिद्धांत सिर्फ मानसिक उड़ानें या अटकलबाजी थे। वे तर्क या तथ्य पर
आधारित नहीं थे। दर्शन के क्षेत्र में उन्होंने किसी नए सामाजिक चिन्तन को
जन्म नहीं दिया।
- इसलिए उन्होंने वैदिक ऋषियों के दर्शन को बेकार समझकर अस्वीकार कर
दिया।
2. कपिल-दार्शनिक
भारत के प्राचीन दार्शनिकों में सबसे प्रमुख कपिल थे।
उनका दार्शनिक दृष्टिकोण अद्वितीय था। दार्शनिक के रूप में वे अपने आप में
एक दार्शनिक वर्ग ही थे। उनका दर्शन ‘सांख्य-दर्शन’ कहा जाता था। 3. उनके दर्शन के सिद्धांत चौंकाने वाले थे।
- सत्य के लिए प्रमाण आवश्यक है। सांख्य परम्परा का यह पहला सिद्धांत है।
प्रमाण के बिना सत्य का अस्तित्व नहीं।
- सत्य को प्रमाणित करने हेतु कपिल ने केवल दो प्रमाण स्वीकार किए_ (1)
प्रत्यक्ष और (2) अनुमान।