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प्रत्यक्ष का अर्थ (इन्द्रियों द्वारा) वर्तमान वस्तु के मानसिक बोध से है।
अनुमान तीन प्रकार का होता है-(1) कारण से कार्य का अनुमान, जैसे बादलों
की उपस्थिति से वर्षा का अनुमान, (2) कार्य से कारण का अनुमान, जैसे
घाटी की नदियों में जल प्रवाह बढ़ने से पहाड़ों पर वर्षा का अनुमान और, (3)
सादृश्य के आधार पर अनुमान, जैसे एक आदमी एक स्थान से दूसरे स्थान पर
जाता है, तो वह स्थान परिवर्तन करता है या तारों को अनेक स्थानों पर देखकर
यह अनुमान लगाते हैं कि वे भी एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाते हैं।
उनका अन्य सिद्धांत-सृष्टि की उत्पत्ति और उसके कारण से संबंधित था।
कपिल ने इस सिद्धांत को नकार दिया कि किसी सृष्टि-कर्ता ने विश्व का
निर्माण किया है। उनके अनुसार उत्पन्न वस्तु पहले से ही कारण में विद्यमान
रहती है, जैसे मिट्टी से बरतन या धागों से कपड़ों के टुकड़े बनते हैं।
- यह पहला आधार है, जिसके कारण कपिल ने इस सिद्धांत को अस्वीकार कर
दिया कि विश्व का निर्माण किसी एक सत्ता द्वारा हुआ है।
लेकिन उन्होंने अपने मत के समर्थन में और भी आधार बताए हैं।
असत् किसी कार्य का कारण नहीं हो सकता, कोई नई उत्पत्ति नहीं है। उत्पाद,
वस्तु उस सामग्री से अलग कुछ नया नहीं है, जिससे वह बना है। उत्पाद वस्तु
के अस्तित्व में आने से पहले वह उस सामग्री के रूप में पहले से विद्यमान
थी, जिससे उसका निर्माण हुआ है। किसी एक निश्चित सामग्री से किसी एक
खास वस्तु का ही निर्माण हो सकता है, और कोई विशेष सामग्री ही कोई खास
परिणाम दे सकती है।
तब वास्तविक विश्व का मूल स्रोत क्या है?
कपिल ने कहा कि वास्तविक विश्व के दो रूप हैं-व्यक्त (विकसित) और
अव्यक्त (अविकसित)।
व्यक्त वस्तुएँ अव्यक्त वस्तुओं का स्रोत नहीं हो सकतीं।
व्यक्त वस्तुएँ ससीम होती हैं और यह सृष्टि के मूल स्रोत के स्वभाव से असंगत
हैं।
- सभी व्यक्त वस्तुएँ एक दूसरे के सदृश्य होती हैं, इसलिए कोई भी व्यक्त वस्तु
दूसरी व्यक्त वस्तु का अंतिम स्रोत नहीं मानी जा सकती। साथ ही, चूँकि ये
सभी एक ही स्रोत से अस्तित्व में आई हैं, इसलिए ये स्रोत नहीं हो सकतीं।