82 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
- कपिल ने आगे तर्क दिया था कि कार्य को अपने कारण से भिन्न होना ही
चाहिए, यद्यपि उस कार्य में कारण अवश्य ही निहित होता है। यदि ऐसा है
तो विश्व स्वयं ही अंतिम कारण नहीं हो सकता। इसे किसी अंतिम कारण का
उत्पाद (परिणाम) होना ही चाहिए।
- जब पूछा गया कि अव्यक्त की अनुभूति क्यों नहीं होती, इसमें अनुभूति होने
योग्य इन्द्रिय गोचर क्यों नहीं होती? कपिल ने उत्तर दिया-
- ‘‘यह अनेक कारणों से हो सकता है। सूक्ष्म रूप के कारण इसकी अनुभूति
नहीं होती, ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार अनेक वस्तुओं के अस्तित्व होते हुए
भी उनकी अनुभूति नहीं होती है, अथवा अत्यधिक दूरी या अत्यधिक निकटता
के कारण उसकी अनुभूति न होती हो, अथवा किसी तीसरी वस्तु के बीच में
बाधक बन जाने के कारण अथवा कोई समान वस्तु के सम्मिश्रण के कारण
अथवा किसी तीव्र वेदना की उपस्थिति के कारण अथवा अंधापन के कारण
अथवा इन्द्रिय-दोष या मानसिक विकलांगता के कारण अनुभूति नहीं होती
हो।’’
- जब पूछा गया-‘‘तब विश्व का मूल स्रोत क्या हैं? विश्व के व्यक्त और अव्यक्त
रूप में क्या अंतर है?’’
- कपिल का उत्तर था-‘‘व्यक्त वस्तुओं का कारण होता है और अव्यक्त वस्तुओं
का भी कारण होता है। लेकिन दोनों के स्रोत का कोई कारण नहीं है, वह
स्वतंत्र है।’’
- ‘‘व्यक्त वस्तुओं की संख्या अनेक है। वे क्षेत्र और नाम से सीमित हैं उनका
स्रोत एक ही है-वह नित्य और सर्वव्यापी है। व्यक्त वस्तुएँ क्रियाशील होती
हैं और उनके अंग होते हैं। सभी में स्रोत आसन्न होता है, लेकिन न तो वह
क्रियाशील होता है और न ही उसके अंग होते हैं।’’
- कपिल ने तर्क दिया कि अव्यक्त के विकास की प्रक्रिया उन तीन मूल तत्वों
की क्रियाओं द्वारा होती हैं, जिनसे वह निर्मित होती है। वे तत्व हैं-सत्व, रज
और तम। ये तीन गुण कहे जाते हैं।
- इनमें से पहला सत्व से हमारा तात्पर्य प्रकृति में प्रकाश से है, जो प्रकट करता
है, जो मनुष्यों को सुख देता है। दूसरा जो प्रेरित करता है, संचालित करता है,
क्रियाशीलता उत्पन्न करता है। तीसरा गुण जो भारी है, रोकता है, उपेक्षा या
निष्क्रियता को उत्पन्न करता है।