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- तीनों गुण परस्पर सम्बद्ध होकर क्रियाशील होते हैं। वे एक-दूसरे पर हावी हो
जाते हैं, वे एक-दूसरे के सहायक होते हैं और वे एक-दूसरे में मिल जाते हैं।
वे परस्पर क्रियाशील होकर दीपक की लौ, तेल और बत्ती की तरह प्रकाशित
होते हैं।
- जब तीनों गुण पूर्ण संतुलन में होते हैं, एक दूसरे पर कोई हावी नहीं होता है,
तो उस समय विश्व अचेतन प्रतीत होता है और विकास रुक जाता है।
- जब तीनों गुण संतुलित मात्रा में नहीं होते हैं, तो वे एक दूसरे पर हावी हो
जाते हैं और विश्व सचेतन हो जाता है एवं विकास आरंभ हो जाता है।
- ये गुण असंतुलित क्यों हो जाते हैं? ऐसा पूछे जाने पर कपिल का उत्तर था कि
तीनों गुणों के संतुलन में बाधा दुःख की उपस्थिति के कारण उत्पन्न होती है।
कपिल के दर्शन के सिद्धान्त कुछ-कुछ इसी प्रकार थे।
सभी दार्शनिकों की अपेक्षा बुद्ध कपिल के सिद्धान्तों से ही अधिक प्रभावित थे।
केवल उनके दर्शन की ही शिक्षाएँ बुद्ध को तर्कसंगत और कुछ-कुछ यथार्थता
पर आधारित लगीं।
- लेकिन बुद्ध ने कपिल की सभी शिक्षाओं को स्वीकार नहीं किया। कपिल की
केवल तीन बातें ही बुद्ध को स्वीकार्य थीं।
- उन्होंने स्वीकार किया कि सत्य प्रमाण पर आधारित होना चाहिए। यथार्थता
बुद्धिवाद पर आधारित होना चाहिए।
- उन्होंने स्वीकार किया था कि इस मान्यता के पीछे कोई तार्किक या तथ्यपरक
आधार नहीं है कि ईश्वर का अस्तित्व है या ईश्वर ने ही विश्व की उत्पति
की है।
उन्होंने स्वीकार किया कि संसार में दुःख है।
कपिल की अन्य शिक्षाओं को अपने उद्देश्य के लिए प्रासंगिक न समझकर,
उन्होंने ग्रहण नहीं किया।
3. ब्राह्मण-ग्रन्थ
- वेदों के बाद धार्मिक पुस्तकों में ब्राह्मण ग्रन्थ आते हैं। दोनों ही ग्रन्थ पवित्र
माने जाते थे। वास्तव में ब्राह्मण-ग्रन्थ वेदों के ही भाग हैं। दोनों साथ-साथ हैं
और उनका एक सम्मिलित नाम ‘श्रुति’ है।