84 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
चार अभिधारणाओं पर ब्राह्मण दर्शन आधारित था।
सबसे पहली अभिधारणा थी कि वेद न केवल पवित्र हैं, बल्कि अपौरुषेय हैं
और उन पर प्रश्न चिह्न नहीं लगाया जा सकता।
- ब्राह्मण दर्शन की दूसरी अभिधारणा ‘आत्मा की मुक्ति’ थी। इसका अर्थ पुनर्जन्म
से छुटकारा है, जो केवल वैदिक यज्ञों, धार्मिक कर्मकांडों को पूरा करने और
ब्राह्मणों को दान देने से ही मिल सकती है।
- ब्राह्मणों के पास वेदों की तरह न केवल आदर्श धर्म के लिए एक सिद्धांत था,
बल्कि एक आदर्श समाज के लिए भी सिद्धांत था।
- आदर्श समाज के इस ढांचे का नामकरण उन्होंने चातुर्वर्ण्य रखा था। यह वेदों
में निहित है और चूंकि वेद तर्कातीत हैं और उन पर प्रश्न चिन्ह नहीं लगाया
जा सकता, इसलिए इस ढांचे के रूप में चातुर्वर्ण भी तर्कातीत हैं और प्रश्न
चिन्ह से परे हैं।
समाज का ढांचा कुछ खास नियम पर आधारित था।
पहला नियम था कि समाज चार भागों (वर्णों) में विभक्त होना चाहिए-(1)
ब्राह्मण, (2) क्षत्रिय, (3) वैश्य, और (4) शूद्र।
- दूसरा नियम था कि इन चार वर्णों में सामाजिक समानता नहीं हो सकती। उन्हें
आपस में क्रमिक असमानता के नियम से बंधा होना चाहिए।
- सबसे ऊपर ब्राह्मण को रखा गया। ब्राह्मण के नीचे लेकिन वैश्यों के ऊपर
क्षत्रियों को रखा गया। वैश्यों को क्षत्रियों के नीचे लेकिन शूद्रों से ऊपर रखा
गया और शूद्रों को सबसे नीचे रखा गया।
- ये चारों वर्ण अधिकार एवं विशेष सुविधाओं में एक-दूसरे के समान होने का
दावा नहीं कर सकते। अधिकार एवं विशेष-सुविधाओं का मामला क्रमिक
असमानता के नियम के अनुसार ही संचालित होता था।
- ब्राह्मण को वे सभी अधिकार एवं विशेष सुविधाएं प्राप्त थीं, जिनकी वह इच्छा
रखता था। लेकिन एक क्षत्रिय उतना अधिकार एवं विशेष सुविधाओं का दावा
नहीं कर सकता था, जितना कि एक ब्राह्मण कर सकता था। एक वैश्य की
अपेक्षा उसके पास अधिक अधिकार एवं विशेष सुविधाएं प्राप्त थीं। वैश्य के
अधिकार एवं विशेष सुविधाएं शूद्रों की अपेक्षा अधिक थीं। लेकिन वह एक
क्षत्रिय के बराबर दावा नहीं कर सकता था। शूद्र को कोई अधिकार प्राप्त नहीं