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था, तो विशेष सुविधाओं की तो बात ही कहाँ उठती है। उसका विशेषाधिकार
केवल यही था कि वह ऊपर के तीनों वर्णों को रुष्ट किए बिना, जीवित कर
उनकी सेवा करता है।
- चातुर्वर्ण्य का तीसरा नियम व्यवसाय के विभाजन से संबंधित था। ब्राह्मण का
व्यवसाय पढ़ना, पढ़ाना और धार्मिक कृत्यों का संचालन कराना था। क्षत्रिय का
व्यवसाय युद्ध करना था। व्यापार वैश्य के हिस्से में था। शूद्रों का व्यवसाय ऊपर
के तीनों वर्णों की सेवा करना था। अलग-अलग वर्णों के व्यवसाय अनन्य रूप
से अलग थे। एक वर्ण दूसरे के व्यवसाय को नहीं अपना सकता था।
- चातुर्वर्ण्य का चौथा नियम शिक्षा के अधिकार से संबंधित था। चातुर्वर्ण्य के ढांचे
के अनुसार शिक्षा का अधिकार ऊपर के तीन वर्ण, ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य
को ही प्राप्त था। शूद्रों को शिक्षा के अधिकार से वंचित रखा गया। चातुर्वर्ण्य
का यह नियम केवल शूद्रों को ही शिक्षा के अधिकार से वंचित नहीं रखता
था, बल्कि ब्राह्मणों, क्षत्रियों और वैश्यों की स्त्रियों को भी शिक्षा के अधिकार
से वंचित रखा गया था।
- पाँचवा नियम था। इसके अनुसार मनुष्य के जीवन को चार भागों (स्तरों) में
बाँटा गया था। पहली आश्रय ब्रह्मचर्य, दूसरी गृहस्थाश्रम, तीसरी वानप्रस्थ और
चौथा आश्रय संन्यास की अवस्था कहलाती है।
- प्रथम आश्रम का उद्देश्य अध्ययन और शिक्षा था। दूसरी आश्रम का उद्देश्य
विवाहित जीवन बिताना था। तीसरी अवस्था का उद्देश्य आदमी को वन-वासी
जीवन से परिचित कराना था अर्थात् घर को छोड़े बिना ही पारिवारिक बंधनों
से मुक्त होना। चौथे आश्रम का उद्देश्य आदमी को संन्यासी बनकर इस योग्य
बनाना था कि वह ईश्वर की खोज में और उससे मिलने का प्रयास करे।
- इन आश्रमों के लाभ केवल ऊपर के तीन वर्णों को पुरुषों के लिए थे। पहला
आश्रम शूद्रों और स्त्रियों के लिए खुला नहीं था। इसी प्रकार अंतिम आश्रम भी
शूद्रों और स्त्रियों के लिए वर्जित था।
- ‘आदर्श-समाज’ के लिए इस प्रकार का दिव्य ढांचा था, जिसे चातुर्वर्ण्य कहा
गया था। ब्राह्मणों ने इस व्यवस्था को आदर्शवादी बनाया और आदर्श में किसी
प्रकार की कमी नहीं छोड़ी।
- ब्राह्मणी दर्शन की चौथी अभिधारणा कर्म के सिद्धांत की थी। यह आत्मा के
पुनर्जन्म के सिद्धान्त का एक भाग था। ब्राह्मणों का ‘कर्मवाद’ के इस प्रश्न