86 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
का उत्तर था-‘‘नए जन्म में आत्मा नया शरीर लेकर कहाँ जन्म लेती हैं?’’
ब्राह्मण-दर्शन का उत्तर था कि यह आदमी के पूर्व-जन्म के कर्मों पर निर्भर
करता है। दूसरे शब्दों में, यह उसके कर्म पर निर्भर करता है।
- ब्राह्मणवाद के प्रथम सिद्धांत का बुद्ध ने जोरदार शब्दों में विरोध किया। उन्होंने
उनकी इस अभिधारणा को अस्वीकार कर दिया कि, वेद अपौरुषेय हैं और उन
पर प्रश्न नहीं किए जा सकते।
- बुद्ध की दृष्टि से तर्क से परे कुछ हो नहीं सकता और कुछ भी अंतिम नहीं
हो सकता। जब भी जरूरत हो सभी कुछ पुनर्परीक्षण एवं पुनर्विचार के लिए
हमेशा मस्तिष्क खुला रखना चाहिए।
- आदमी को सत्य और यथार्थ सत्य अवश्य जानना चाहिए। बुद्ध के लिए विचार
की स्वतंत्रता सबसे महत्वपूर्ण बात थी और उनको इस बात पर पक्का विश्वास
था कि विचारों की स्वतंत्रता सत्य की खोज का एक मात्र साधन है।
- वेदों के तर्क से परे (अपौरुषेय) मानने का अर्थ विचारों की स्वतंत्रता को
अस्वीकार करना है।
- इन्हीं कारणों के चलते ब्राह्मणी-दर्शन की यह अवधारणा उनको सबसे अधिक
घृणित लगी थी।
- ब्राह्मणी-दर्शन की द्वितीय अवधारणा के भी वे उतने ही सख्त विरोधी थे। बुद्ध
ने यह तो स्वीकार किया कि यज्ञ में कुछ अच्छाई है, लेकिन उन्होंने सच्चे यज्ञ
और झूठे यज्ञ में अंतर किया।
- दूसरों के कल्याण (भलाई) के लिए आत्म-परित्याग की भावना में किए गए
यज्ञ को उन्होंने सच्चा ज्ञान माना। व्यक्तिगत लाभ हेतु ईश्वर या देवता पर
चढ़ावा के नाम पर जीव-हत्या की दृष्टि से किए गए यज्ञ को उन्होंने ‘झूठा
यज्ञ’ कहा।
- ब्राह्मणवादी-यज्ञ मुख्यतः अपने देवताओं को खुश करने के लिए पशुओं की
बलि ही थी। ‘झूठे यज्ञ’ कहकर उन्होंने इसकी निन्दा की। आत्मा की मुक्ति
‘मोक्ष’ के उद्देश्य से किए गए ऐसे यज्ञ को बुद्ध ने स्वीकार नहीं किया।
- जो यज्ञों के विरोधी थे, वे ब्राह्मणों का यह कहते हुए उपहास किया करते
थे-‘‘यदि एक पशु की बलि से कोई स्वर्ग जा सकता है, तो अपने माता-पिता
की बलि देनी चाहिए, क्योंकि यह स्वर्ग जाने का सबसे आसान रास्ता है।’