3. ब्राह्मण-ग्रन्थ - Page 116

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  1. बुद्ध पूर्णरूपेण इस विचार के समर्थक थे।

  2. यज्ञ सिद्धांत की ही तरह बुद्ध को चातुर्वर्ण्य सिद्धांत भी घृणास्पद लगता था।

  3. ब्राह्मणवाद द्वारा स्थापित चातुर्वर्ण्य के नाम पर समाज संगठन की कल्पना उनको

सर्वथा अप्राकृतिक लगती थी। इसकी वर्णाश्रित संरचना अनिवार्य और मनमानी

थी। यह एक आदेश देकर बनवाये समाज के समान था। वे एक खुले एवं

स्वतंत्र समाज के पक्षपाती थे।

  1. ब्राह्मणों की चातुर्वर्ण्य की एक जड़ सदृश्य समाज-व्यवस्था थी, जिसमें परिवर्तन

संभव नहीं था। एक बार जो ब्राह्मण के घर पैदा हो गया, वह सदा के लिए

ब्राह्मण हो गया। क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र भी एक बार जो जहाँ पैदा हो गया,

वह सदा के लिए वही हो गया। समाज, रचना का आधार जन्म के आधार पर

आधारित था। बड़े से बड़ा पाप करने से किसी व्यक्ति की प्रतिष्ठा और पद

का दर्जा नीचे नहीं हो सकता था और न बड़े से बड़ा पुण्य कर्म किसी का

दर्जा बढ़ा सकता था।

  1. असमानता सभी समाजों में थी। लेकिन ब्राह्मणवाद में यह अलग किस्म की

थी। ब्राह्मणों द्वारा उपदेशित असमानता आधिकारिक धार्मिक सिद्धांत थी। वह

केवल विकसित ही नहीं थी। ब्राह्मणवाद समानता में विश्वास नहीं करता था।

वास्तव में, उसने समानता का विरोध किया गया था।

  1. ब्राह्मणवाद असमानता से ही संतुष्ट नहीं था, बल्कि ब्राह्मणवाद की आत्मा

क्रमिक असमानता में ही बसी थी।

  1. बुद्ध ने सोचा कि इस क्रमिक असमानता से समाज में सद्भाव न आकर ऊपर

के वर्णों के प्रति घृणा और नीचे के वर्णों के प्रति अवमानना या जुगुप्सा की

भावना बढ़ेगी, जो स्थायी संघर्ष का स्रोत बन सकती है।

  1. ब्राह्मणवाद ने चारों वर्णों के लिए व्यवसाय भी निश्चित कर दिए थे। व्यक्ति

को व्यवसाय के चयन की स्वतंत्रता नहीं थी। साथ ही, ये पेशे कमोवेश रुचि

एवं दक्षता के आधार पर निश्चित न होकर जन्म के आधार पर निश्चित थे।

  1. चातुर्वर्ण्य के नियमों का ध्यानपूर्वक सिंहावलोकन करने पर बुद्ध को इस निर्णय

पर पहुँचने में कोई परेशानी नहीं हुई कि ब्राह्मणवाद द्वारा निर्मित सामाजिक

व्यवस्था का दार्शनिक आधार अगर स्वार्थपरक नहीं था, तो गलत अवश्य

था।